सफ़र पे निकलने से पहले हमें हमेशा अपनी पैकिंग एन वक़्त से
पहले ही कर लेने चाहिए ताकि कोई भी चीज
छुट न जाये| कभी काबर तो ऐसा भी होता है की सब पैक हो चुका होता है और कुछ चीजे
हमारी लापरवाही के कारण छुट जाती है| तो
कभी उन चीजों के बिना काम चल जाता है, तो कभी किसी चीज के छुट जाने से जिंदगी की
गाड़ी, दौड़ने की ज़गह चलने लगती है|
उस दिन ट्रेन छुटने ही वाली
थी,सारा सामान हम ट्रेन में रखवा चुके थे
पर फिर भी कुछ छुट रहा था | आज भी मुझे याद है की कैसे ट्रेन खुलने के आखरी सेकंड्स तक
वो स्टेशन की भीड़ में कभी उसे ढूंढती तो कभी अपने मोबाइल को देखती| आख़िरकार ट्रेन
खुल पड़ी, मोबाइल साइलेंट पड़ा रहा और वो एक
हलकी सी मुस्कराहट के साथ दरवाजें से अपने सिट पर जाके बैठ गयी| उससे एक आदमी ने
पूछा था, कि बिटिया कुछ छुट तो नहीं गया?
उस दिन उसने ‘’ न ‘’ कहा था पर आज लगता है , हाँ शायद कुछ छुट ही गया था |
वो उसका सबसे अच्छा दोस्त था, शायद इसलिए उसे
काव्या से ऐसी उम्मीद न होगी| काव्या और आशु सालों पुराने दोस्त थे , उनकी दोस्ती
ऐसी की अगर एक कुछ भी काण्ड करे तो नाम दोनों का आये| चोक्लेट और कॉफ़ी दोनों में से कोई भी खाए या पिए ,पर आशु ही चोक्लेट का बिल पे करे तो काव्या कॉफ़ी
की| हॉस्टल की छुट्टियों में हम सब अपने घर जाते पर काव्या पहले आशु के घर दो दिन रहती फिर अपने घर
झाँसी जाती| मुझे आज भी याद है ,मास्टर्स के आखरी दिनों में वो कैसे एक दूसरे से
कटे कटे रहने लगे थे मानों दोनों एक दूसरे को किसी गलती की सज़ा दे रहे थे| आखरी
बार भी जब मैंने कॉफ़ी हाउस में उन दोनों को मिलने के लिए बुलाया था, उस दिन भी वो
दोनों चुप से थे | आशु ने कुछ देर बाद भी
अपनी चुप्पी तोड़ी भी तो काव्या से बस यही
पूछकर,की उसकी सारी पैकिंग हो गयी, सब ले लिया न! कुछ छुट तो नहीं रहा? उस दिन पता
नहीं क्यों वह अचानक बिना बोले ही उठकर चली गई थी और कुछ देर बाद आशु भी पहली बार
कॉफ़ी का बिल पे कर चला गया |
आखरी दिन काव्या और मैं
सर्टिफिकेट्स लेकर कॉलेज से लौट रहे थे,की गेट पर ही हमें आशु मिल गया| वो खुश था और हमारे रास्ते के लिए खाना और कुछ
चोक्लेटेस लाया था | उसे देखकर काव्या भी खुश हो गई और पता नहीं, अचानक उसे क्या
सूझी की उसने उसी वक़्त चोक्लेट की रैपर निकाली और उस पर कुछ लिखने लगी | आशु ने पूछा : काव्या सब ले
लिया ना! अपने फैले सामान को बटोर कर रख
लिया न ,वैसे भी तुम्हारी पुरानी आदत है, एन वक़्त पर चीजो को पैक करना और फिर छुटी
हुई चीजों के लिए मुझे दौड़ना| काव्या ने कहा : हाँ, पर इस बार भी कुछ छुट रहा है,पर
अब ये तुम पे है की इस बार तुम मेरे लिए
भागों गे या नहीं | इतना कहकर वो चोक्लेट के गोल्डन रैपर उसे पकड़ा के भाग गयी|
काव्या की जिंदगी उस दिन के
बाद आज भी वैसी ही हैं, वो खुश है और मेरे पूछने पर की उस दिन उसने ऐसा क्या लिख
कर आशु को दिया था कि ,की दो साल हो गए, उसका एक मैसेज तक नहीं आया? तो उसका यही
जवाब होता है - मैंने अपनी मन की बात कही थी उसे, मैं उसे अपनी
मन की बात बिना बताये वहां से लौट नहीं सकती थी,हमारा रिश्ता हमेशा से ही
निस्वार्थ था और मैंने उसे अपने साथ कभी बाँधा नहीं था, मैंने उस दिन भी उसे कहा था की
अब ये उसकी मर्जी हैं,की वो मेरे छुटे सामान के पीछे भागेगा या नहीं ?
काव्या
कहती है की उसे आज भी लगता है कि कभी न कभी आशु रिप्लाई जरुर करेगा,तो कभी वह दुखी
होकर बच्चों की तरह मुझसे पूछती है कि आशु
कही उस दिन के बाद से ,उससे नाराज तो नहीं हो गया, कही वो उससे नफ़रत तो नहीं करने
लगा? ये सवाल पूछते पूछते कभी कभी उसकी आँखे छलक पड़ती है| सच कहूँ तो मुझे उसकी
आँखों में प्यार खोने से ज्यादा, एक दोस्त के खोने का ज्यादा दुःख नज़र आता हैं|
फिर भी आज भी जब कभी हम
अकेले बैठते है, और आशु की बात आती है तो वह कहती हैं: यार मैंने तो एप्लीकेशन और
सिवी तो डाल दी थी न ! अब उसने डिलीट कर दी हो या पेंडिंग रखी हो, पर मुझे खुशी है मैंने कोशिश तो की |मैंने
पूरी कोशिश तो की न! अपनी पैकिंग पूरी करने की ,ताकि कुछ छुट न जाये,अधुरा न रह
जाये,जाने से पहले,सफ़र से पहले और ............... कुछ छुटने से पहले|
