मेरे स्मृतियों का शहर.........
‘बांस का शहर’
शाम को ऑफिस से आते वक्त जब मैं दिल्ली के ची-पों
से दुखी हो जाती हूँ और मेट्रो की भीड़ भाड़ में मेरी आँखे थक कर झपक जाती है तो
अक्सर मैं एक शहर को अपनी कल्पनाओं से देखती हूँ। उस सफ़र को फिर से जीने की कोशिश
करती हूँ जिसके सफ़रनामे को लिखने के लिए मेरे शब्द कम पड़ जाते हैं। उस वक्त मुझे
कोई ऐसा साथी नहीं मिलता जिसे मैं बिठा कर उन कहानियों को सुना सकूं। बता सकूं,
उससे पूछ सकूं कि हे..... सुनो न! तुम कभी मणिपुर गए हो.....कोहिमा गए हो। तुमने देखा है कभी उत्तर पूर्व के इस कोहिनूर
को......
पिछले 12 साल से मैं इस कोशिश में हूँ कि काश!
मैं कभी इस शहर को लिखने लायक शब्द जुटा पाती...उतने ही सुंदर शब्द जितना सुन्दर मेरा
वो शहर है....पर लखनऊ के दस साल और दिल्ली के 2 सालों में मेरे उन शब्दों में और
कमी आ गई। रोज़ाना की दौड़- भाग में मेरा मन अशांत को दिशा भटक जाता है। दुनिया जब
राजनीति, हिंसा और मानवाधिकार की बातोँ में खोई है तो मेरी आत्मा ‘बांस के शहर’
जाकर चुपके से सोना चाहती है......
पर इससे पहले कि दिल्ली की
व्यस्तता, जीवन में रोज घटित होती कहानियों और ऑफिस के बेतुके किस्सों में मेरा यह
‘बांस का शहर’ विस्मृत हो जाए मैं आज इसे लिखना चाहती हूँ
साल 2003-2004 ।।।।।।
उन दिनों मणिपुर में थान्गजम मनोरमा देवी के
रेप और हत्या के विरोध में मणिपुरी औरतें सड़कों पर उतर आई थीं। हमारे यहाँ आर्मी
कैंट में सब्जी- फल ईमा लोग (ईमा- दादी या शायद माँ कहने के लिए प्रयुक्त होने
वाला शब्द) बेचने आया करती थी। ईमा ने बताया करती थी कि बाहर के हालात बहुत बुरे
हैं। लोग आर्मी वालों से नफ़रत करते हैं और हो सकता है कि कोई आर्मी वाला कैंट के
बाहर बाज़ार में दिखा तो वे लोग उन्हें वही मार दें।
एक मंडे हमारी स्कूल बस बहुत
रुक रुक के स्कूल के लिए जा रही थी। हमेशा की तरह मैं वक्त का फायदा उठा कर सो रही
थी. बहुत देर बाद जब नींद खुली और अहसास हुआ कि अरे! स्कूल नहीं आया अभी तक... तो
पता लगा बाहर प्रोटेस्ट चल रहा है और आर्मी गाड़ियों को नहीं जाने दिया जा रहा है.
कुछ देर बाद बस में बैठे
बड़े भईया-दीदी की फुसफुसाहट से पता चला कि कुछ ईमा लोग इंडियन आर्मी के खिलाफ ‘न्यूड
प्रोटेस्ट’ यानी नंगे हो कर धरना दे रही थी।
हम तब कर्नाटक के ‘बेलगाम’ से वहां आए
थे। मैं वहां केन्द्रीय विद्यालय 2, लंगजिंग में कक्षा तीन या चार में पढ़ती थी। उस
दिन मैथ्स का यूनिट टेस्ट भी था। खैर, भगवान
की कृपा से टेस्ट नहीं हुआ..... मैं बच गई थी क्योंकि रात भर के अथक प्रयास के बाद
भी मुझे टेबल्स याद नहीं थे। उस दिन शहर भले
ही जल रह था पर मेरा बालमन टेस्ट कैंसिल हो जाने से बेहद आनंद में था।
साल 2004 में जहां मणिपुर
अफस्पा के विरोध में जल रहा था वहां बिहार में मेरे दादाजी की दिन दहाड़े, उन्हीं
के स्कूल के सामने गोली मार कर की गई हत्या ने वैशाली जिला की नींद उड़ा रखी थी।
बिहार में लालू- राबरी (राबड़ी देवी) का जंगल राज अपने उन्माद के अंत पर था। राज्य
में दिन दहाड़े डॉक्टर, इंजिनियर, पत्रकार, आईएस- आईपीएस का अपहरण और हत्याएं हो
रही थी और बस इंताजर था तो राज्य में 2005
के चुनाव का। जनता ने नीतीश कुमार को लाने का मन बना रखा था और उधर मेरे पापा ने
मणिपुर से पोस्टिंग का।
बहुत कोशिशों के बाद पापा
को पोस्टिंग मिली पर नागालैण्ड...
साल 2004-2005.....
नागालैण्ड की यादें मेरे बचपन की यादों का सबसे सुनहरा दौर
था। यह शहर बेहद ख़ूबसूरत था और मणिपुर से शांत भी। इस शहर पर प्रकृति की बड़ी कृपा
थी। नीला आसमां, पहाड़ों से कल- कल बहती ठन्डे पानी के छोटे झरने। आसमां में बादल
छाते नहीं थे कि वो किसी पहाड़ से टकरा कर झड जाया करते। यहाँ दिल्ली में सावन भी
नहीं बरसता और वहां पूरे साल सावन की झड़ी लगी रहती थी...
वहां सीढ़ीनुमा खेतों के बीच
पूरा शहर बसा हुआ था। रात को हमारे क्वार्टर से पूरा शहर जगमगाया हुआ दिखाई पड़ता
था। मानों पूरे शहर ने तारोँ से जड़ा चादर ओढ़ रखा हो और सामने के पहाड़ पर बसा हुआ ‘कैथेड्रल
कैथोलिक चर्च’ उन सभी जगमगाते तारों में शहर का सबसे जगमगाता तारा था।
क्या दिन थे वे........आहा!
हमारा स्कूल के.वी. सी.आर.पी.एफ
कैम्प, कोहिमा भी बहुत प्यारा था। एक पहाड़ पर प्राइमरी सेक्शनस तो दूसरे पर सेकेंडरी सेक्शनस। वहां चारो तरफ
पाम के पेड़ थे। छुट्टी में हमारी बस जब देर से आया करती तो हम लोग पाम खाया करते
थे या वहीं का कोई खट्टा –मीठा जंगली फल।
शहर में ‘वॉर- समाधि’ थी और
वो एक पुराना चर्च- ‘कैथोलिक चर्च’। बाकी वहां के कोहिमा गांव, जप्हू चोटी और
त्योफेमा गांव काफी ख़ूबसूरत गांव थे जिसे देखने के लिए बाहर से पर्यटक भी आया करते
थे। वहां हर कोई शांत और अपनी संस्कृतियों में डूबा हुआ था। क्रिसमस के दिनों में
तो शहर और भी ख़ूबसूरत बन जाता था। पूरा शहर विभिन्न प्रकार के केक -पेस्ट्री के
सुगंध से सुगंधित हो जाता था। लोग दो हफ्ते पहले से ही क्रिसमस कैरोल गाने लगते थे।
बच्चे नाचा -गाया करते थे।
वहां बिहार और बांग्लादेश
से आए बहुत से विस्थापित लोग भी थे। सब असमिया और बांग्ला में मिली जुली भाषा
बोलते थे। मुझे याद है कि वहां मैंने औरतों को ही ज्यादातर काम करते हुए देखा था...चाहे
कोई दुकान हो, व्यापार या खेती – किसानी आदि।
अब सबसे ज़रूरी बात जो मेरे
लिए उस समय बहुत अनोखी थी वहां किसी रेल-लाइन का न होना। मुझे आज भी याद है कि पहाड़नुमा
रास्ते पर हम कैसे बस से एक-दो दिन का लंबा सफ़र तय करके दीमापुर पहुंचते थे। वहां से एक ट्रेन थी ‘बीजी
एक्सप्रेस’, उससी से हम गुवाहाटी जाते थे और फिर वहां से ‘अवध आसाम एक्सप्रेस’
पकड़कर ब्रह्मपुत्र पार करते हए जलपाईगुड़ी और बरौनी होते हुए अपने घर हाजीपुर,बिहार
पहुंचते थे।
उन दिनों महज़ तीन दिन के
ट्रेन के सफ़र में ही ट्रेन की खिड़कियों से मैं नजाने कितने शहरों को झांकते हुए
आती थी। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बीच मैंने कितने प्रकार के लोग, उनकी भाषा,
खान-पान और संस्कृति को देखा था। अब जब कि मूल- संस्कृतियां विलुप्त हो रही है तो
मेरा मन बार बार जाना चाहता है उस प्रदेश जहाँ, सावन साल भर का सिंगार था। मन करता
है काश! कोई मुझे उसी देश ले जाए.....उस प्रदेश ले जाए जहाँ, बांस के फूलों से मैं
खेला करती थी।
आज भी जब यहां दिल्ली में
आकाशवाणी की खिड़कियों से मैं सूरज ढलते हुए देखती हूं तो मेरा मन उसी गोधूलि को
देखना चाहता है। जहाँ पलाश के फूलों की झुरमुट छाँव तले सूर्य ढलता था और शहर तारो
की चादर ओढ़, उस सर्द मौसम में बिना किसी साथी के... बांसुरी बजाते हुए गुमनाम सफ़र पर
निकल जाता था...... आह! कितना सुन्दर था – मेरे स्मृतियों का वह शहर ‘ बांस का शहर’...








