इंसानी फ़ितरत है यह
हम अपने आप से ही जयादा
कतराते हैं,
दुनिया को जानने का दावा
करते है,
पर खुद को ही नहीं, जान पते
हैं|
डरतें है हम अपने मन से
हर वक़्त एक झूठी शोर में जीतें है,
कहीं यह दिल सच न कह दे,
हर पल इस डर से होठों को सीते हैं,
इंसानी फ़ितरत है यह
अपने आप से भागते फिरते हैं|
हम उन गलियों में लौटना
चाहते ही नहीं,
जिसमे हमारे निशां हैं,
क्युकि हम जानते है कि कहीं
वो गलियां हमारे गुमनाम होने पर सवाल न करदे,
इंसानी फ़ितरत हैं यह वह भागते है,
दर्द से,शांति से,गलतियों
से क्युकि
अपने सचाई को वह हर पल
मारते हैं,
बेहिसाब भागते हैं|