Friday, 29 August 2014

इंसानी फ़ितरत


इंसानी फ़ितरत है यह

हम अपने आप से ही जयादा कतराते हैं,

दुनिया को जानने का दावा करते है,

पर खुद को ही नहीं, जान पते हैं|

         डरतें है हम अपने मन से

         हर वक़्त एक झूठी शोर में जीतें है,

         कहीं यह दिल सच न कह दे,

         हर पल इस डर से होठों को सीते हैं,

          इंसानी फ़ितरत है यह

         अपने आप से भागते फिरते हैं|

हम उन गलियों में लौटना चाहते ही नहीं,

जिसमे हमारे निशां हैं,

क्युकि हम जानते है कि कहीं वो गलियां हमारे गुमनाम होने पर सवाल न करदे,

 इंसानी फ़ितरत हैं यह वह भागते है,

दर्द से,शांति से,गलतियों से क्युकि

अपने सचाई को वह हर पल मारते  हैं,

बेहिसाब भागते हैं|

                         

Tuesday, 26 August 2014

उन्हें भी तकलीफ है,मेरी अनदेखी से


किसी शाम जब मैं और मेरी किताबे डेट पर जाती है,तो अक्सर उनकी शिकायत होती है कि तुम अपना वक़्त सबको देती हो पर मुझे नहीं|आज शाम भी कुछ ऐसा ही वाकिया हुआ.आज बहुत दिनों बाद मैं  अपने  स्टडी रूम की सफाई करने पहुंची.मैंने जैसे ही कमरे में पैर रखा,सबसे पहले मेरे लैंप ने अपना बल्ब फ्यूज कर मेरा स्वागत किया|इतना ही क्या कम था कि जब मैंने अपने कोर्स की किताबो को उठाया तो किताब गिर कर फट गयी मानो कह रही थी मैडम जी, कभी हम पर भी दया दृष्टी करिए|

उस दिन वो अलमारी धूल से सनी हुई थी. निराला बेखबर से एक कोने में पड़े थे, तो एक कोने में बच्चन. नीचे के अगली ही शेल्फ में प्रेमचंद्र और कीट्स जहां अपनी ही दुनिया में मग्न थे वहीँ दुष्यंत कुमार और ग़ालिब मेरी नई लाई किताब 'रात पश्मीने की' गुलजार के साथ मिलकर कुछ नए गीत और अंतरा बना रहे थे. इन सबसे दूर धर्मवीर भारती और दिनकर खामोशी से अपनी जगह टिके हुए थे. इस शेल्फ को मैंने जैसे ही हाथ लगाया कि गुनाहों के देवता गिर पड़े और चेतन भगत गिरते ही बिखर गए. शायद किसी किताब से ही वो कागज का टुकड़ा गिरा हो जिस पर लिखा था 
सुनो, 
तुम्हारे संबंध अब गूगल हो चले हैं, इसलिए हमारा रिश्ता फेसबुक हो गया है. जहां तुम चैट पर रहकर भी चैट ऑफ़ कर गूगलिंग करने निकल लेती हो .....             

ग़ालिब के शब्दों में कहूँ तो 'ग़ालिब तुम बड़े बेदर्द निकले,दिल लगाया और बेवफा कर दिया'. सच कहूँ तो मैं खुद ही आज गुनाहों के देवता बन गयी हूँ |

आज घंटो मान मनुहार चला तब जाके कहीं वह माने. फिर वह कहने लगे, सुनो तुम गूगल के ज्यादा करीब हो और अब हमारा रिश्ता फेसबुक हो चला है. जिसमें तुम चेट पर रहकर भी चेट ऑफ कर मुझे छोड़ छिप छिप के गूगल से बात करती हो. मुझे बुरी लगती हैं तुम्हारी यह अनदेखी|फिर दो कप चाय पिकर मेरे और उनके बिच की यह गुफ्तगू आखिरकार मेरे माफी मांग कर,हर शाम उनके साथ लॉन्ग ड्राइव के समझौते और वादे पर ख़त्म हुयी|     

 

Monday, 25 August 2014

mere dost mahan


वो रंग दो चार,वो बातें हजार,वो मुस्कुराहट बे हिसाब,

वो घंटों बारिश में भीगना ,फिर यूँ ही छाते को हवाओं के हवाले करना

वो गोल गप्पे की दुकान,वो ट्रैफिक पुलिस,मोटा पहलवान

वो राह चलते इमलियों पर निशाने,कभी अमरूद के ठिकाने,

खुलती थी  हमारी खुशियों की दुकान,

ऐसे थे मेरे दोस्त महान|

पहले खुद ही गलतियाँ करना,फिर बे वजह किसी बात पर अड़ना,

खुद मुंगफली के छिलके उड़ना,फिर नाम किसी और का लगाना,

दुसरो के सीक्रेट का भांडाफोड़ कर जाना,

और बार बार यह दुहराना,

हम है खुदा के शरीफ बन्दे,पर कभी बन जाते हैं गुंडे,

ऐसे थे हमारे स्लोगन,दोस्ती गान

ऐसे थे मेरे दोस्त महान |

अब हो गयी है मेरी दुनिया वीरान,

कहाँ हो मेरे दोस्त महान?

दो  अपने दोस्ती की पहचान,

लौट आओ मेरे दोस्त महान|

Sunday, 24 August 2014

naraj hun khud se


आज पूछती है मेरी कहानी मुझसे,

क्या नाराज हो मुझसे?

आज पूछती है मेरे ही सवाल मुझसे,

क्या नाराज हो मुझसे?

आज पूछती हैं कुछ भाव  मन  से

क्या नाराज हो खुदसे?

   इन सवालो के जवाब,सच्चे हैं या झूठे पता नहीं,

बस इतना पता है,

आज नाराज हूँ खुद से|

Saturday, 23 August 2014

alarm baj gaya


मेरे कमरे के एक कोने में एक घड़ी लगी हैं और दूसरे खोने में ही एक पिक्चर गैलरी.इस पोट्रेट में मेरे घरवालों की कीमती यादों से भरे कुछ पल हैं.एक शाम जब मैं यूँ ही अपने उस दिवार को निहार रही थी तब मेरी नजर अचानक घड़ी के उन टिक टिकाते सुई पर पड़ी.उस घड़ी की और देखते देखते मुझे एक ख्याल आया.

हमारी जिंदगी भी तो एक घड़ी जैसी है जहाँ एक वक़्त हमारी दुनिया में सिर्फ दो लोग महत्व रखते है ठीक वैसे ही जैसे घड़ी के दो सुई मिनट वाली और घंटे वाली.पर बाद में उसमे सेकंड्स वाली सुई आकर पूरा का पूरा समय देखने का ही नजरिया बदल देती है और घड़ी अपने एक समय में ही कितनी विविधता के साथ वक़्त की इक  नयी कहानी लिख देती है.

हमारी दुनिया भी यूँ ही गोल है. हम लोग बचपन से मा बाप नाम के इक बिंदु से जुड़े होते है,फिर कुछ सेकंड्स बाद ,यानि कुछ सालो बाद चलते चलते हम अपने लिए राह बनाते है,बस सेकंड्स वाली सुई की तरह चलने  से कुछ मिनट्स पूरे हो जाते है,फिर कही जा कर हम रुकते है ,यानि हमें हमारी मंजिल मिल गयी और जीवन का एक पहर बीत गया.

पर यह क्या,  अब जो मंजिल मिली तो हमने एक पल जो पिछले बिताये सफ़र को देखने के लिए बस पीछे ही मुड़े की,झट से एक पल और बीत गया.और मेरी आँखे भी ठहर गयी.  मैंने देखा, इस लम्बे सफ़र में जहाँ मैं  कितनो के साथ चली थी,आज वह सब लोग कही न कही रुक गए थे .मा पापा दूर जा चुके थे,भाई बहन कहीं खो से गए थे और दोस्तों ने तो दूसरी ही घड़ी में शिफ्ट होने का मन बना लिया था.बस इस गोल घड़ी में सिर्फ, मैं बची थी .

टन,टन,टन.  पलक झपक गयी,घड़ी में १२ बज चुके थे, दो पहर  बीत गया था जिसमे जिंदगी कई पहर आगे चल चुकी थी. अब पता चला कि जिंदगी भी घड़ी की तरह कभी नहीं रूकती,जब तक की उसकी बैटरी न ख़त्म हो जाये.न सुख में ,न ही दुःख में,न किसी के आने से और न जाने से और कही जरा ठहरा भी तो अगले ही पल चलने का अलार्म बज गया.   ‘’it’s time to disko…..ho ho…hoooooo disko

 

 

Friday, 22 August 2014

because every thing has a reason


एक शाम जब मैं अपने कमरे में बैठकर सोच रही थी कि नजाने कितना वक़्त बीत गया कभी अकेले शांति से अँधेरे में बैठे हुए,की तभी मेरे कमरे की लाइट चली गयी| एक पल के लिए तो मुझे ऐसा लगा की शायद मुद्दतो बाद मैंने कुछ दिल से माँगा है,तभी ऊपर वाले ने मेरी इच्छा पूरी कर दी है|

उस वक़्त मैंने बहुत वक़्त बाद परम शान्ति का अनुभव किया,ऐसा लगा की जैसे मानो मैं किसी खुले  आसमान में आ गयी थी| जहाँ अँधेरे के बावजूद ,एक रोशनी काम कर रही थी,और वह रोशनी थी अपने मन की|वहां शांति के बाद भी शोर था,शोर अपने धडकनों की.घडी की पल पल के सफ़र की मैं प्रत्यक्षदर्शी थी | वाह!क्या शोर था वह| बिलकुल अलग जहाँ अपने मन की बातों की खुसफुसाहट,खुद को ही सुनाई पड़ रही थी.

जहाँ दिमाग और दिल के बिच एक संवाद चल रहा था|दिल कह रहा था’’देखो आज पल्लव,कितनी खुश हैं ,तभी आज हमसे मिलाने आई हैं |’’वही दिमाग कह रहा था ‘’हो गयी न तुम भावुक ,ओये पल्लव कोई खुशी से नहीं,किसी टेंशन के कारण अकेले बैठी हैं|’ ’तो दिल ने प्रेम से दिमाग से कहा:खुशी का पता तो नहीं पर वह शांत हैं  ,क्युकी इन्सान अपने आप को तभी सुनता है जब वह शांत और संतुष्ट होता हैं,कि तभी दिमाग बोल पड़ा:हा,हा,हा पल्लव और संतुष्ट,कभी नहीं,वह एक लालची लड़की है ,जिंदगी उसे जो भी दे,वह और की ही मांग करती है |’’ मैं देर तक दिल और दिमाग के बिच  का संवाद सुनती रही और  कुछ देर बाद ही मेरी आँख लग गयी |

मैंने देखा की मैं  एक बगीचे  में थी जहाँ वसंत का आगमन हो चुका था |हर तरफ हरे हरे पेड़ पौधे खुशी से झूम रहे थे ,हर डाली कलियों से भरी हुयी थी,पंछी उड़ रहे थे|उनकी आवाज में नए मौसम के आगाज की चहचहाहट थी| पर अचानक  अगले ही पल हवाओं का वेग तेज हो गया ,उन हवाओं  में जहाँ पेड़ की हर पल्लव हिल गयी थी वहां यह कुछ पल्लव बची थी| लगा जैसे कि उन वसंती हवाओ में पतझरी हवाए चलने लगी और बचे हुए पल्लव भी टूट गए| 

अचानक मेरी आँख खुली ,मैंने पाया कि लाइट आ चुकी थी.पर अभी भी मेरी आँखों में वह सपना था और कुछ प्रश्न. जहाँ ,एक पल पूरा पेड़ हरा था वही दूसरी पल वह पिला कैसे हो गया? एक पल जहाँ तेज हवाओं में वही पल्लव झूम रहे थे ,वही दूसके पल उन्ही हवाओं में वह टूट कर कैसे  बिखर  गए  थे?

शायद इन सबका जवाब मैं जानती थी, पर  मानती  नहीं हूँ क्युकी................

     This all things happens just because of scientific reasons, और अगर यह मेरे बारे में था तो, मैं  पल्लवी हूँ,जो जिद्दी और लालची है और यह लाइट जाने से मुझे शांति नहीं मिली बल्कि बस काम न करके सोने का बहाना मिल गया. और हमारे इस मुख्यमंत्री को वोट न देने का कारण|

Thursday, 21 August 2014

अलविदा


 प्रिय,

        यूँ तो मेरी गलियों में आज भी आवारा आशिकों की कमी तो नहीं है,पर तुम जैसा इस दुनिया में कोई दूजा आशिक शायद न कोई था और न होगा.यूँ तो लोग मेरी गंभीर शक्ल और तमतमाते गुस्से से देखकर ही मुझ से बाते करने तक की रिस्क नहीं उठाते पर तुम्हारी हिम्मत की तो मैं भी  कायल हो गयी हूँ .

वाह!तुम्हारा यूँ मेरे बगीचे में छुपे रहना और शाम होते ही बिना किसी फिक्र के मेरी खुली हुई खिडकियों से बिन पूछे मेरे कमरे में घुस जाना तुम्हारी आवारा हरकतों पर पक्के आशिकों का मुहर लगाता हैं.  हद तो तुम सर्दियों में कर देते हो जब सबके सामने तुम सीधे दिन दहाड़े दरवाजे से आकर मेरी अलमारी और पलंग के निचे छुप जाते हो.पता है तुम्हे, कई बार तो माँ ने भी तुम्हे आते देख लिया था तभी तो रोज रात वह तुम्हारी अच्छी धुलाई करवाती थी.   मुझे तुम्हे यूँ मार खाते हुए देखकर कभी कबार तो बुरा लगता था पर एक बार जब तुम्हारी वजह से मुझे १० दिनों तक बुखार में रहना पड़ा तो कही न कही तुम्हारे दुःख से मुझे भी ख़ुशी मिलती थी .मुझे याद है कि तुम्हारे प्रकोप से बचे रखने के लिए तो मा ने मुझे दूसरे कमरे में भी शिफ्ट कर दिया था पर तुम तब भी ना माने .तुम तब भी अपने आवारा साथियों के साथ मुंह उठाये चले आते थे .सबसे बड़ा गुस्सा तो मुझे तुम पर तब आया था जब तुम्हारे एक साथी’’एडिस’’ से लड़ाई के समय मेरा भाई  घायल हो गया था. तुम्हारे उस दोस्त ने तो मेरे गबरू जवान भाई को भी बिस्तर पर कुछ दिनों के लिए पहुंचा दिया था.

सच पूछो तो तुम्हारे काम के प्रति,तुम्हारी निष्ठा का सही अंदाजा तब हुआ जब हमने अपना घर बदल दिया पर हम तुमसे निज़ात न पा सके .उस दिन उस नए कमरे में जहाँ की दीवारे भी ,मुझे नहीं पहचानती थी वहां तुम्हारे सुरीले गानों की दस्तक  और तुम्हारे आने से मेरे कमरे में,मेरे पुराने कमरे जैसी रौनक लग गयी थी.उस दिन के लिए तुम्हे दिल से शुक्रियां.

देखो अब जो मैं  तुम्हे कहने जा रही हूँ ,उसे सुनकर तुम्हे बुरा ही लगेगा पर यह सच है.सुनो अब मैं   बीस साल की हो गयी हूँ,और अब मुझे तुम्हारा खेल खेल में काटकर रशेस करना मुझे अच्छा नहीं लगता .अब तुम मेरे कमरे से खुद ब खुद ही निकल जाओ नहीं तो तुम्हे,तुम्हारे औकाद मुझे याद दिलानी  पड़ेगी .तुम उम्र के साथ और  भी आवारा होते जा रहे हो की तुमने तो मेरी २ साल की भतीजी को भी नहीं छोड़ा.पता है तुम्हारी बदमाशियों की वजह से कल रात वो कितना रो रही थी.सुनो मैं  तुम्हे दिल से दुआ देकर अपने कमरे से विदा करना चाहती हूँ न की काला हिट और रैकेट से मारकर.सो अब मेरे प्रिय आवारा आशिक मच्छर महोदय आपसे मेरा विनम्र निवेदन है कि मेरी परेशानियों को समझते हुए, मुझे हर रात चैन की नींद प्रदान करे नहीं तो जरुरत पड़ने पर जरुरी कारवाही की जाएगी.

सो मेरे प्रिय,अब कह भी दो अलविदा,सुना है अलविदा कहने से फिर मिलने की उमीद कम हो जाती है|

अलविदा,

  तुम्हारी प्रिय ‘’पल्लव’’.

Wednesday, 20 August 2014

टूटता तारा


जब कभी जमीं पर सितारों की जगमगाहट,चाँद के उजालों में छिप कर मेरे छत पर नहीं आती,उस रात मेरे लिए पूरा का पूरा आसमान की देखने योग्य नहीं रहता.मुझे याद  है कि गर्मियों की इन रातों में    अक्सर जब आसमान साफ़ रहता था तो वो सारे तारे मुझ से  एक एक कर गप्पे लगाया करते थे.आसमान के हर कोने के वह सितारे मेरी छत के हर कोने से दिखाई पड़ते थे पर अब सितारों ने मेरे छत से शायद अपना मुंख मोड़ लिया हैं या अब शायद वह पृथ्वी के इस गोलार्ध से ही जा चुके है या उन्हें हमारे वातावरण के प्रदुषण युक्त परतों ने ढक लिया हैं .

पता नहीं क्या हुआ है,बदलाव किस्मे आया है ?क्या मेरी आँखों ने आसमा को फुर्सत से झाकना बंद कर दिया है या उन तारों ने मेरे घर का रास्ता भुला दिया है.मैं कुछ नहीं जानती ,जानती तो बस इतना हूँ कि भले आसमा में चाँद का आकर जितना भी बड़ा हो ,उसकी चांदनी कितनी भी सीतल क्यों न हो, वो आसमान के उन सितारों की रौशनी की जगह नहीं ले सकता.

उन एक एक तारों को देख कर ही मैं  हर रात अपनी नयी काल्पनिक दुनिया में खो जाती थी,जो बहुत सुकून भरी होती थी. पर अब मेरी दुनिया में कल्पना से परे ही एक कहानी है,जिसके पन्नों में हर चौबीस घंटे की लिखापढ़ी हैं,वास्तविकता से उसका इतना सम्बन्ध है कि कभी कबार दिल करता है की यह दुनिया भी पलक झपकते ही ख्वाबो की तरह बदल जाती .काश! की कभी ऐसा हो जाये कि एक शाम एक टूटता तारा अपने साथ मुझे भी इस निष्ठुर दुनिया से एक नए सफर पर ले जाये जहाँ सिर्फ और सिर्फ रौशनी ही हो और अंधरे को ख़तम करने के लिए किसी चाँद और सूरज की रौशनी की जरुरत न पड़े.

मेरे हिसाब से तारों की जगमगाहट,किसी चाँद ,सूरज से  नहीं होती और शायद हर टूटते तारे की कमी हमें और चाँद , सूरज को ना हुई हो पर आसमां को हर टूटते तारे की कमी जरुर महसूस होती है, क्युकी उसके लिए तो हर तारा’’इक तारा है,जो खास और प्यारा है .          

Tuesday, 19 August 2014

वो पंखविहीन चिड़ियाँ


उस दिन शाम जब मैं और पूजा बगीचे में खेल रहे थे,तब एक नन्ही सी चिड़ियाँ गुलाब के फूलों के पास आ छुपी थी.खेलते खेलते मेरी नज़र उस चिड़ियाँ पर पड़ी .हम उसके जितने करीब जा रहे थे वो उतनी ही दूर हम से दूर फूलों से चिपटी जा रही थी मानो हम दोनों ही एक दूसरे के साथ नुक्का छिपी खेल रहे हो .अचानक कहीं से एक और उस जैसी एक बड़ी चिड़ियाँ आयी और वह छोटी चिड़ियाँ को साथ ले गयी,शायद वह उसकी माँ थी.अगले ही शाम जब हम फिर बगीचे में खेलने आये तो वह छोटी चिड़ियाँ वही हमारा इंतजार कर रही थी ,हम दोनों जैसे जैसे जहाँ जहाँ छिपते और दौड़ते वह भी हमारे साथ उड़ती.धीरे धीरे दिन बीते और हमारी दोस्ती और भी पक्की होती गयी.अब मेरा और पूजा का हर शाम उसके साथ बीतने लगा.हम उसके लिए दाने भी लाया करते थे और वह हमारे लाती थी,ढेर सारा स्नेह और मुस्कुराहट.

एक दिन जब हम शाम को बगीचे में पहुंचे,तो काफी इंतजार के बाद भी हमें वह न मिली .पता नहीं वह उस दिन कहाँ चली गयी थी,?यु ही इस तरह हम दोनों उसका घंटो इंतजार करते रहे पर वह नहीं लौटी .हम अक्सर एक दूसरे से सवाल करते की वह चिड़ियाँ अब यहाँ क्यों नहीं आती ,नजाने वह कहाँ चली गयी है?

एक हफ्ते बाद जब एक दिन हम बगीचे में खेल रहे ते तब हमारी नजर उसी गुलाब के फूलों की ओर गयी .हमने देखा की वह चिड़ियाँ वहां घायल हालत में पड़ी थी,ऐसा लग रहा था की मानो उसे किसी  पतंग के मांझे से चोट लगी हो,उसके पंखों में से खून बह रहा था,हम उसे तुरंत ही घर ले आये .उसके मरहम पट्टी भी की और यूँ ही काफी दिनों तक हम उसकी सेवा में लगे रहे.हर दिन स्कूल से आने के  बाद हम दोनों उसे देखने चले जाते थे और पूरी शाम उसके साथ ही बिता कर घर लौटा करते थे,हमने उसके रहने का इंतजाम बगीचे के एक पेड़ पर किया था.हमारी दवाई से उसका जख्म तो टिक होने लगा था पर पर हमारी दावा उसके मन के जख्मो को ठीक न कर पाई थी.वह चिड़ियाँ अब उड़ नहीं पाती थी.अब धीरे धीरे उसने दाना खाना भी बंद कर दिया था,और अब बोलना भी न के बराबर हो गया था .शायद जिस पतंग ने उसके पंख छीने थे उसने उसका होंसला भी छीन लिया था और एक दिन उसके मरे हुए मन के साथ ही उसका भी निधन हो गया.

हमें दुःख है की हम उसे बचा न पाए,हम उसे उसकी सीमाहीन उड़ान  न लौटा पाए,मुझे पहली बार अहसास हुआ की एक चिड़ियाँ के लिए उसके पंख उसकी जान  होते है,उसका सीमाविहीन उड़ान ही उसकी पहचान होते है .आज सबसे बड़ा दुःख तो मुझे इस बात का है की वह उड़ान अब ख़तम हो गयी है,किसी  के शौखिये खेल ने किसी का शौख छीन लिया था  और किसे से उसकी अनमोल दोस्त.

आज पता चला की आजादी,उमंग और शौख किसी के पंख होते है और अगर उन पंखो को जरा सी चोट लग जाये तो आत्मा दुखी हो जाती है. गर जो पंख किसी के वजह से कट जाये तो मौत अपने आप हो जाती है.हमारी प्यारी दोस्त अब नहीं है,अब जब भी कभी हम आसमान को देखते है तो याद  आती है वह गरबीली चिड़ियाँ, वह पंखविहीन चिड़ियाँ .     

Monday, 18 August 2014

parichaya jindagi se


ऐ जिंदगी, तुझे चाहने की कोई खास बात तो नहीं ,

बस तेरे अँधेरी गलियों में खोने का ,मजा आ रहा है ,

ऐ जिंदगी ,तुझे जीने की कोई खास चाहत तो नहीं ,

बस तुझे जानने का हुनर आ रहा है ,

ऐ जिंदगी, तेरी जमी मुझे कुछ खास भा तो नहीं रही,

पर तेरे आसमां में, उड़ने का जज्बा आ रहा है .

   ऐ जिंदगी, तेरी राहों में चलने की राहत तो नहीं ,

पर इन राहों के घाव,मेरे सपनों की किमत बता रहा है .

ऐ जिंदगी ,तेरी इबादत में कोई यकीं तो नहीं ,

  पर कुछ पल के लिए तेरे सजदे में सर, झुका जा रहा है.

ऐ जिंदगी ,तेरे उजालों में कोई खास रोशनी तो नहीं,

पर एक पल के लिए ही सही ,दिल डरा जा रहा है .

ऐ जिंदगी, तेरी कहानियों में कोई शोर तो नहीं,

पर अपना ही सही,शोर सुना जा रहा है .

   ऐ जिंदगी, तेरे मजाक में कोई हंसी तो नहीं,

पर फिर भी ये व्यंग,सहा जा रहा है.

ये जिंदगी, तेरी मौत में कोई शांति तो नहीं ,

पर शांति का ढोंग,ये ज़माना रचा जा रहा है .

ऐ जिंदगी तेरे काटों से सुख तो नहीं,

पर फिर भी,उन फूलो से ,बेबाक मुहब्बत करा जा रहा है,

ऐ जिंदगी, तुझे जीने की कोई खास चाहत तो नहीं ,पर चला जा रहा है. 

Sunday, 17 August 2014

कितनी मुदत बाद मिले हो


 

 

कितनी मुदत बाद मिले हो ,

ओं पतझर के परदेशी,

सावन बिता ,पतझर बिता,बीत गए वह सारे दिन .

सावन बिता ,पतझर बिता,बीतगए वो सारे  दिन ,

राहे बदली,यादे बदली,बदली जिंदगी की तस्वीरे,

न बदली तो वह चाहते,

और दरवाजे पर  वही पुरानी आहटे .

कई बार यह गुमां होता है ,

की मेरे ख्वाबो को शायद  जंग लगी है ,

पर अगले ही पल  महसूस होता है,

 अब हौसलों को पंख लगी है.

         कितनी दरखतो में जिंदगी बीते,

हाले  दिल बायाकरना मुश्किल है.

पर उन्ही दरखतो में वह आग छुपी है ,

जिसकी जरुरत आज हमें  पड़ी है ,

कितनी मुदत बाद मिले हो,

ओं रूठे मौसम के साथी ,

 कहाँ छुपे थे तुम अब तक, ओं पतझर के परदेशी.सावन बिता ,पतझर बिता ,बीत गए वो सारे दिन,कितनी मुदत बाद मिले हो.             

Saturday, 16 August 2014

TALASH EK NAYI SUBH KI


नजाने कितना वक़्त बीत गया,कुछ शाम ऐसी महसूस होती है जैसे मानो तुम अभी आओगी और कहोगी ‘’क्या मुकुल,तुम अभी भी यहीं खड़े हो,अभी तक फ्रेश नहीं हुए ,तुम कितने आलसी हो गए हो.’’

कितना निस्वार्थ था न तुम्हारा प्यार मेरे लिए,कितनी मर्माहत थी तुम्हारे उन सवालो में ,वो तेरा बातो बातो में ही गुस्सा  हो जाना ,फिर अगले ही पल किसी बहाने एक सौरी के साथ गलती मान जाना .कितनी अजीब थी न तुम! और तुम्हारे सवाल भी.मुझे आज भी याद है की एक तरफ तुम्हारा वो एंग्री वीमेन वाला लुक,और दूसरी तरफ बिन मांगे ही मदत कर देना .शायद  मुझे तुम्हारे इसी सख्त स्वभाव से प्यार हुआ था और शायद तुम्हारी वही स्वाभाव और आत्मसमान आज हमारे बिच की सबसे बड़ी दूरी है.

  मुझे आज भी याद  है कि हमारी शादी तुम्हारे आत्मसम्मान बनाये रखने की शर्त पर हुयी थी,पहले तुम्हे मेरे लिए डाइनिंगटेबल पर बैठ देर रात इंतजार करते देख अच्छा लगता था ,पर फिर मेरी अनदेखी ,मेरा बदता स्वभाव,मेरा घंटो काम करना तुम्हारे और मेरे बिच की ख़ामोशी कब बन गयी मुझे इस बात का कभी अहसास भी न हुआ .

पर अब अहसास है,तुम्हारे दूर जाने की,मैं यह नहीं कहता  की तुम गलत हो और मैं  सही. पर गलतियाँ  तुमसे भी हुयी थी और कुछ मुझसे भी .मैं  जनता हु कि तुम बहुत स्वाभिमानी हो ,स्ट्रोंग हो और शायद कभी न माफ करने वाली गलती की सजा तुम्हारा मुझे यु छोड़ जाना है.पर इन सबके बाबजूद मैं एक नया ख्वाब देखना चाहता हूँ,चाहता हूँ कि तुम मेरी मुहब्बत फिर बन आओ,लौट आओ क्युकि तुम मेरी  पहली और आखरी मुहब्बत हो .  यह कहने की फिर से गुस्ताखी करना चाहता हूँ  कि तुम्हारी आँखे आज भी मेरी खबर रखती है और दिल चाह कर भी मुझे इग्नोर  नहीं कर पता,तो क्या तुम  अपने दिल की सुन कर मेरे साथ नहीं चल सकती,    क्या हम दोनों साथ  मिलकर नहीं कर सकते ‘’फिर से एक नयी सुबह की तलाश . 

Friday, 15 August 2014

oosh ki ek bund


जो  रह गई ,सो गई ,
     जो  सह गई,सो सह गयी
दब गयी किसी पल्लव की छाँव में
वो ओस की एक बून्द ,
मेरे आँगन में छूप गई।
                          मुदतो  बाद मिली हो तुम ,
             नजाने कितना  कहने को है तुमसे ,
पर सुकून है की तुम अब लौट आई हो ,
मेरे आँगन में वो बसी रही ,
ओस  की वह बून्द मेरे आँगन में छिपी रही।
                              जो पल्लवों पर छिपी रही ,
                                      धुप ई पहली किरण से बची रही ,
                               वह बची रही,डटी रही ,
                           तुम्हारे सज़दे  में झुकी रही ,
                         ओस  की वह बून्द मेरे आँगन में छिपी रही। मौसम भले ही अब बदल जाये ,
 मेरा साथ जो तुम्हे न भाये ,
अब ना छोड़ अब वो न मुझे जाएगी ,
जीवन के  पहर के बाद,
वो गम हो जाएगी '
वो कह गयी मुझे ,
ओस की एक बून्द ,
मेरे आँगन में छिप  गयी।