Tuesday, 25 March 2014

aakhri khat,us muhabbt ke naam


                                                   आख़री ख़त, उस मुहब्ब्त के नाम



मेरे प्रिय,
                        
            बिन मौसम बरसात जब कभी होती है,मेरे दरवाज़े पर तुम्हारे यादों कि खटखटाहट होती है| आज भी जब प्यार, मुहब्ब्त  कि बात होती हैं तो,बनारस कि वो हमारी आखरी मुलाकात बाइस्कोप में चलती तस्वीरो कि तरह सामने आ जाती है | उफ़ यह सिदते मुहब्ब्त मिल जाये तो इससे बड़ी ख़ुशी नहीं और बिछड़े  मुहब्ब्त  से कही मुलाकात हो जाये तो उससे मुश्किल घड़ी नहीं | उस दिन भले ही तुम मुझसे दूर होगए , और मैंने भी हमारे इस फैसले में सर झुकाया था पर हामी नहीं भरी| आज हम दूर है एक दूसरे से, और शायद मेरे इस ख़त का अब कोई मतलब नहीं बनता पर सोचा कि जाने से पहले तुम्हें कमसेकम अपने मन कि बात कह दूँ|
      कुछ गलतियाँ मुझसे हुई थी तो कुछ तुमसे ,तुमने कभी मुझसे कुछ कहा नहीं तो न मैंने कभी जाना| तुम दिमाग कि बात करते थे तो मैं दिल की| कल मै फ़िर वहीं गई थी,उसी चौराहें तक | मेरी नजरें कल भी तुम्हें ढूंढ़ रही थी पर हमेशा कि तरह मैं घर लौटी,तुम्हारे यादों के साथ|
पता है तुम्हें, तुम्हारी यादें भी तुम्हारी तरह ही निस्ठुर हैं,पूरी रात मैं सो नहीं पायी इसलिए नहीं कि वह यादें थी पर इसलिए क्योकि वह तुम्हारी यादें थी । तुम भले ही मुझे भूल गए होगे पर
             सुनाई देती है यादें,दिल से कान लगा कर देखो,
                        सुनाई देंगी वह यादें,किताब से तस्वीर निकाल कर देखो,
                    सुनाई देती है यादे,अपने कमरे के दरवाज़े पर देखो ,
                    सुनाई देंगी वह बातें ,मेरी कब्र पर जाके देखो ,
                    दिखाई देगा वह प्यार,इस बरसात में भींग कर देखो,
मैं खड़ी हुँ वहीं जहाँ तुम मुझे छोड़ कर गये थे , बनारस के उसी घाट पर
 हर मौसम में सुनायी देंगी वह यादें,मेरी आख़री ख़त पढ़ कर देखो |
फिर मिलेंगे,अलविदा|   
तुम्हारी प्रिय,
मुहब्ब्त |   

Saturday, 22 March 2014

is tarah ham alag huye(ek swarthi kahani)

                                           इस तरह हम अलग हुए(एक स्वार्थी कहानी)


कहते है इंसान अगर अपने स्वार्थ,शान और दौलत कि रेस में उतर जाये तो सारे रिस्ते नाते,प्यार,मुहबत अपने आप ही पीछे छूट जाते हैं। मेरी जीवन रूपी किताब का एक अंश थे वह दिन जिसकी आहट आज भी मेरी यादों में होती हैं| आज भी जब मेरी डायरी के पन्ने कि वह तारीख़ आँखो के सामने आती है तो दिल एक बार फिर दोहराता हैं काश कि वह दिन फिर लौट आते | पर कहते हैं न कि जीवन एक फुलप्रूफ प्लान कि तरह है, जिसमे हुई गलतियों को डिलीट कर ठीक करने कि गुंजाइश नहीं होती |
4 /9 /2006 ,
                     मेरा वह 21 वॉ जन्मदिन,उम्र कि एक वह दहलीज़ जहाँ अक्सर माँ पापा के बंधन खत्म होने लगते हैं | उठते ही माँ पापा की बधाई और उसके मैसेज के साथ मेरा दिन शुरू हुआ,पर मुझे तो शाम का बेसब्री से इंतजार था क्योकि पास के कॉफी हाउस में मेरा कोई इंतजार कर रहा था| शाम होते ही मैं नीले रंग के ड्रेस में तैयार हो जल्दी से वहाँ पहुँच गई | कॉफी हाउस के अंदर जाते ही मेरी नज़र कार्नर में सजे हुए टेबल पर पड़ी जो लाल और पीले रंग के गुलाब कि पंखड़ियों सजा हुआ था पर उसके आस पास कोई नहीं था | मैं यहाँ वहाँ देख रही थी कि तभी मेरे कानो ने सुना -हैप्पी बर्थडे टो यू,,,,,,,,,,,और मैं मुड़ी।मैंने देखा कि वहाँ मेरे दोस्त और देव खड़ा था और यह सारी तैयारियाँ उन सब ने मेरे लिए किया था| बहुत प्यारा था मेरा वह जन्मदिन और शायद ही अब कभी ऐसा हो मेरा जन्मदिन|
8/9/2006
                  देव और मैं एक दूसरे को बचपन से जानते है| देव कि कहानी मेरी कहानी जैसी है यानि मेरी जिंदगी सी बिलकुल वही लक्ष्य को पाने कि जुनून और वही स्वार्थी पन जो स्वभाव को लॉजिकल और संवेदन हिन् बना दे । आज वह पुणे जा रहा है अपने एमबीए कि पढ़ाई के लिए| देव के माँ बाप पुणे में ही रहते हैं और देव यहाँ दिल्ली में अपने दादा के साथ पिछले आठ से रहता था | हम दोनों स्कूल से ग्रेजुएशन तक साथ ही पढ़ते थे, और पहली बार मुझे किसी के दूर जाने से दुख हो रहा था मानो शायद देव के साथ मेरा बचपन भी छूट रहा था |
         पहले तो शुरुआती दिनों में देव और मै एक दूसरे से हर दूसरे दिन बात किया करते थे पर धीरे धीरे हमारी बातें कम और काम ज्यादा होना शुरू हो गया| हम दोनों ही अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त थे, कि धीरे धीरे हम दोनों ने एक दूसरे का फ़ोन नंबर भी गुमा दिया|   इस सोशल नेटवर्किंग के ज़माने में हम एक दूसरे को नहीं ढूँढ पाये इस बात का जबाब शायद हमें हमारा स्वार्थी  मन और भगवान ही दे सकता था, और इस तरह हम अलग हुए उसके पुणे जाने के बाद

18 /11 /2013 ,
                       आज़ मैं अपनी कंपनी के एक पार्टी में थी । मैंने पार्टी में देव को देखा,वह वहाँ हमारे कंपनी के मेन आसोसिअट्स में था पर मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि यह वही देव है ,मेरे बचपन का दोस्त देव| जब मेरे बॉस ने उसे इंट्रोडस कराया''देव शर्मा,आवर मेन एसोसिएट्स फ्रॉम पुणे''तो मेरा यकीं सच में बदल गया| काफी सोच विचार के बाद अपने ईगो को साइड में रख मैं देव के पास गई,मुझे देकते ही वह पहचान गया| देव आज भी वैसा ही था,उसने उतावले होकर मेरे सामने -कैसी हो ,कहाँ थी ,,,,,,प्रश्नो कि वर्षा कर दी और साथ में अपना हाँथ भी बढ़ा दिया |
     मैंने जैसे ही उसकी तरफ अपना हाँथ बढ़ाते हुए बोलना शुरू ही किया था कि,तभी एक प्यारे से बच्चे ने आकर देव कि पैंट खिंचते ,एक औरत जिसकी सक्ल से ज्यादा उसकी साड़ी और महंगी घड़ी चमक रही थी,उसकी ओर उँगली दिखाते हुए कहा ''पापा ,मम्मा बुला रही हैं |
बस होना क्या था ,मैं अबाक रह गई और पलभर में ही मेरी सारी कल्पानाओं पर पानी फीर गया| मैंने देव कि आँखों में देखा मानो आज उसने मेरी मन कि बात समझ ली थी और मैं दुखी मन से घर लौट आई  |मैं पूरी रात सो नहीं पायी ,मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे दुःख किस बात का हुआ ?देव की शादी का या इस बात कि शायद वो जगह मेरी हो सकती थी,या एक जलन जो एक औरत को दूसरे औरत कि सफल जिंदगी से होता हैं| हाय यह स्वार्थ,जो हमारा नहीं होता,उसपर भी अपना हक़ जताना चाहता है |
19 /11  /2013,
                         आज सुबह मेरी मोबाइल पर अंजान नंबर से कॉल आया,उठाने पर पता चला कि वह देव का कॉल था| उसने मुझे फिर उसी कॉफी हाउस में मिलने बुलाया था,आज फिर मैं वही गई थी| आज भी देव मेरा उसी कार्नर के टेबल पर इंतजार कर रहा था पर इस बार उस टेबल पर न लाल गुलाब थे न पीले मानो वक़्त भी यही कह रहा हो कि ''पलक,अब न प्यार बचा है और न शायद दोस्ती |
           मेरे जाते ही देव कुछ कहता कि मैं उसपे तुरंत चिल्ला पड़ी,मैंने कहा,'' देव,तुम मुझे भूल गए थे ना?आज इतने साल बाद भी मैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी ,इंतजार अपने दोस्त का और शायद प्यार का| आज पहली बार मेरे दिल ने सच कहा था या फिर उसने भावनाओं का मजाक बनाकर अपने स्वार्थ और जलन को प्यार का नाम दे दिया था | पता नहीं यह क्या था पर मुझे पहली बार इतना दुःख हो रहा था,पर इस बात ने हम दोनों को शांत कर दिया था| उस शांत वातावरण कि चुप्पी देव के उस आखरी बात ने तोड़ी ''सच कहा पलक,प्यार''और आज हमेशा के लिए इस तरह हम अलग हुए |   


      आज हम दोनों ने अपने झूठे घमंड को देखा जो हमें हमारी कामयाबी पर था,और आज यहाँ से देखने पर हम अकेले नज़र आ रहे थे,बिल्कुल अकेले साथ थी तो बस अपसोस।अपसोस कि हमने अपने दिमाग का इतना इस्तेमाल किया था कि दिल कि भावनाये मर चुकी थी| आज मुझे एहसास हुआ कि इस कामयाबी कि दौड़ में, मैं शायद अवव्ल थी पर भावनाओं कि दौड़ में  पीछे और अकेले,सब आगे है, शायद देव भी।
           अब मेरी डायरी के पन्ने खाली पड़े हैं क्योकि अब इस में लिखने को कोई कहानी नहीं है | अब मेरे पास कामयाबी है पर कोई अपनी कहानी नहीं,जिसे मैं यह नाम दे सकूँ ''एक स्वार्थी कहानी| '' 

 

 

Friday, 21 March 2014

PHOOL KHUMAHLANE LAGE HAI(POEM ON CHILD LABOUR)

                                        फूल कुम्हलाने लगे है

 
  क्यों ये फूल कुम्हलाने लगे हैं,
बागों को छोड़कर सड़क पर नज़र आने लगे हैं,
फूल कुम्हलाने लगे है |

                वह फूल जिनकी जग़ह है बगिया'
                  वह कूड़े के ढ़ेर में,
            अपनी मुस्कुराहट लुटाने लगे हैं,
            फूल कुम्हलाने लगे है|

 यूँ तो हमारे देश में नहीं हैं विद्यालयों कि कमी ,
  फिर क्यों?यह विद्यार्थी नहीं ,
 सड़कयात्री कहलाने लगे है,
पैसे कि राह में बहुमुल्य बचपन,
बिताने लगे हैं,फूल कुम्हलाने लगे है। 

यूँ तो नियम व कानून की,
दलीलें है नजाने कितने,
आरक्षण,सरकारी स्कूल,मिड डे मील जैसे
पहेली है जितने।
आज समाज बाल शोषण के नाम पर
बहाने बनाने लगी है,
यह नन्हें मासुम फूल,
अस्तित्वहिन हो जाने लगे है,
फूल कुम्हलाने लगे है|

              अपने भाषणों में हम,हमारे नेता
विकास की,देते तो हैं दलीलें,
तो फिर क्यों यह फूल
कड़ाके कि ठण्ड हो या गर्मी,
नंगे पाँव सड़क पर,
नज़र आने लगे हैं,
ये फूल कुम्हलाने लगे हैं|
 
 नजाने कब यह हालात बदलेंगें,
कब यह तस्वीर बदलेगी,
कब यह फूल बगिया को लौटेंगें'
अपना बचपन जियेंगे,
चाचा नेहरू के यह प्यारे फूल,
कब खिलेंगे?
खिलकर उस क्षितिज को छुयेंगे,
कब?हम कह सकेंगें
 हर हाथ में कलम लहराने लगे हैं,
फूल मुस्कुराने लगें हैं,
बगियों को सजाने लगे हैं।                

BACHPAN(POEM)

                                                                      बचपन जिंदगी अगर धूप है ,तो छाव था बचपन
जिंदगी अगर आज शाम है ,तो सुबह था बचपन
जिंदगी अगर किताब है ,तो हमारी कहानी था बचपन
 बचपन कुछ और नहीं ,
  बस एक सुनहरी याद है बचपन |
                              
               वो दादा दादी ,नाना नानी
           सबकी थी अपनी एक कहानी,
               मानो बचपन के साथ हो गयी हो,
             उनकी भी' रवानी ,
               वो अनेक नाम गुड़िया,गुडी,पिंकी ,सिंकी
       जिसमें सबका दुलार हमने था पाया
      पर अब बस अपसोस भर है आया,
    क्यों खो गया वह बचपन ,आ गया यह यौवन।
                
                 वो घंटों झूले झूलना,
                                    झूले कि रेस लगाना,
                                        मानो बस एक लक्ष्य यही हो,
                          कैसे भी आसमाँ को छू जाना,पर अब मानो
                    टूट गया वह झूला,क्योकि छूट गया वह बचपन।   
                     
वो ईदी और मिठाई,
 वह शौख़ नये कपड़ो का,जन्मदिन पर लाखों बधाई,
अगर याद करो,तुम उन त्योहारों को
तो बचपन सब लौटा ले आयी,
आज बचपन कि याद है आई|
               
                       वो दोस्तों कि लंबी रेलगाड़ी,
            मानो हम ही थे डिब्बे और सवारी
 छूक छूक कर चल पड़ती थी वह रेलगाड़ी,
पर आज छूट गयी वह यारी,वह दोस्ती,वह रेलगाड़ी।
अब तो हर शाम उस प्लेटफर्म पर,खड़े रहें पर
फिर भी नहीं आती वह रेलगाड़ी,
वह रेलगाड़ी,जो मुझे मेरे बचपन में ले जाये,
मुझे मेरे अपनों से मिलवाये,
मेरे बचपन कि वह सवारी,
नहीं आती अब वह रेलगाड़ी।

वो गलियों में दौड़ लगाना,
थक कर माँ के आँचल में सो जाना,
फिर वह सूरज,चँदा कि लोरी
आँखों में जिसने कभी मिठी नींद थी घोली ,
पर ना अब वह लोरी है,ना वह मासूम आँखे
अब तो हर रात बस,चिंता भरी होती है,
स्वार्थ,स्वाभिमान,सुख और स्वम से लड़ाई होती है,
और थकी आँखे भी यही कहती है,
''अब ना अम्मा कि आँचल है,
न बाबा के कंधे,थक कर भी तुझे खुद ही चलना है,
क्योकि लक्ष्य है तेरे गहरे।
क्यों छूट गये वह हाँथ,वह स्वार्थहिन प्यार भरे पहरे ,
क्यों खो गया वह अपनापन,
क्यों खो गया वह बचपन। 

                                                
 

Saturday, 15 March 2014

aaoo chale ghar se sansad ki oore

                                                                       आओ चले घर से संसद कि ओर

आज मेरे हाथ पर बंधी घड़ी और बदलते वक़्त की कहानी ही मेरी कहानी का अंश है | मेरे कलाई पर बंधी घड़ी ,जिसके बड़े डिब्बे जैसी डायल और उसकी मोटी कसी सिल्वर बैल्ट जहाँ मुझे वक़्त से बंधी हुई शस्क्त लड़की बनाती है ,वहीं डायल के अंदर का गुलाबी रंग मेरे मन  के मासुम कोने को बयाँ  करती है | पहले तो लड़कियाँ घड़ी बांधा ही नहीं करती थी या बांधती भी तो छुपाकर कलाई के नीचे बिलकुल पुरुषों से विपरीत,उनकी ऊपर तो हमारी नीचे | कहते हैं कि वक़्त तेज़ी से बदलता है पर स्त्रियों के मामलों में तो शायद वक़्त ने भी पैरों में बेड़िया बांध ली हो,आख़िरकार वक़्त बदला और घड़ी कलाई के नीचे से ऊपर आगई | उस युग से इस युग तक,मेरी नज़र सबसे पहले  जिस महिला पर पड़ी जिसके हाथों में मोटी गोल डायल वाली घड़ी कलाई के ऊपर बंधी थी वह थी स्वर्गीय श्रीमति इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी और मैंने सोच लिया कि घड़ी तो मेरी भी कलाई के ऊपर ही बंधेगी |  आज मेरी घड़ी के अंदर इंदिरा गाँघी कि घड़ी की तरह छुपा हुआ स्विस बैंक का अकाउंट नंबर तो नहीं पर घड़ी तो मेरी भी दमदार है |
      पर अगर सोचिये इसी घड़ी का वक़्त मैं पीछे कर दूँ और इतिहास में जाकर सोचूँ कि मैं कहाँ होती ?क्या होती और कैसी होती तो मेरा जवाब होता - मैं भारत में होती ,लड़की होती ,संसद में काम करती और मेरी छवि कुछ कुछ इंदिरा गाँधी जैसी होती | तो मैं बनती हमारे देश की पहली महिला और तीसरी प्रधानमंत्री आदरणीय इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी |  उस वक़्त से इस वक़्त तक की आयरन लेडी,सशक्त  और सम्मान से भरी महिल| क्या हुआ कि मेरे पापा जवाहरलाल नेहरू कि तरह देश के लिए जेल में नहीं रहे,पर कारगिल में देश के लिए सीमा पर तो थे | भले ही इंदिरा कि तरह मैंने इतिहास ''पिता का पत्र पुत्री के नाम से नहीं पढ़ा ,पर इतिहास पढ़ी तो सही | माना कि मैं अपने माँ पापा कि इकलौती औलाद तो नहीं पर इकलौती बिटिया तो हुँ | हिस्ट्री और पॉलिटिकल साइन्स उनकी  पसंद थी तो मुझे इंडियन हिस्ट्री और इंडियन पॉलिटिक्स पसंद है,और अगर आप मेरे काम पर गौर फरमाये कि आज तक मैंने पॉलिटिकल बीट पर ही काम किया है तो इस बात कि पुष्टि हो जायेगी कि कही ना कहीं इस क्रिएटिव राइटर का लंबा विशनरी नारा है ''आओ चले घर से संसद कि ओर ''|
अगर यह सपना है तो सपना ही सही पर मैं हर जन्म में लड़की और एक सशक्त नारी ही बनना चाहती हुँ ,जिंदगी का हर फैसला मेरा हो,मैं डॉमिनेटिंग हुँ और हर किमत पर अपनी धाक बनाये रखूँ | क्योकि ना तो मैं इतनी खूबसूरत और अच्छी कलाकार हुँ कि मैं  मधुबाला और मीनाकुमारी बनजाऊ और मैं ना कभी सीता और द्रौपदी बनना चाहती हुँ और अगर मैं इनकी जग़ह होती तो इनके फ़िल्म कि स्क्रिप्ट उलटी होती | सीता वन वन भटकने कि जग़ह राम को तलाख देकर अपने मायके से पापा का राज पाठ संभालकर कर राज करती तो द्रौपदी पाँच पुरुषों में बटने कि जगह पाँच पांडवों को पाँच टुकड़ो में बाँट देती और सारी की सारी महाभारत वहीं ख़त्म हो जाती | मैं आयरन लेडी ही बनना चाहती हुँ ,भले ही इंदिरा का सफ़र नेहरू से गाँधी तक था पर उन्होनें पापा के सत्ता कांग्रेस को तब सँभाला था मैं आज और कल पापा का मान और काज पाठ संभालूंगी ।उन्होने तबभी जात बिरादरी का दामन नहीं थामा था ,प्यार जिससे हुआ भले ही फ़िरोज गुजराती पारसी थे साथ उन्हीं का दिया | मैं यक़ीन से कह तो नहीं सकती क्योकि मेरे जीवन में कोई फ़िरोज तो नहीं और ना ही चाहिए पर सच्चा और संभला प्यार हुआ तो नेहरू कि तरह पापा को भी मना लूँगी । भले ही सरनेम चेंज हो जाये पर चलूँगी पापा के ही राह पर |
इंदिरा गाँधी बनने का कारण उनकी महानता नहीं उनकी विशेषता है । स्वभाव से कट्टर डॉमिनेटिंग गुस्सेल महिला पर नज़रिया क्रांति से विकास कि ओर | ईस्ट पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाना,पाक को हर बार हराना  और देश को ग्रीन रेवोलुशन के साथ सीटो ,सेंटो और रबीआई को सशक्त बना कर देश को शसक्त बनाना इस बात कि पुष्टि करता है | मैं यह सब करलेती पर १९८४ कि एंटी सीख़ रायट और सालों तक देश में इमरजेंसी लगा हिटलर कि तरह राज ना कर पाती और यही शायद  मेरी खूबी होती या ख़ामी पर आज मैं एक काम जरुर करती । थोड़ी कम पढ़ी लिखी ही सही पर देश की संसद कि आधी जनसंख्या मैं एक एक इंदिरा से भरवाती ,क्या होता फ़ैसले सिर्फ औरतों के पक्ष् में होते ,पर इसमें कोई गलत बात नहीं | गवार तो आज के मंत्री भी है ,सरेआम आशुबम ,चाकू और पेपरस्प्रे से आज वह संसद का यह हाल बना सकते है तो हम थोड़ा और बिगाड़ देते पर देश में रेपिस्टों को पनाह तो ना देते |
  अब बस बात यही है,आज हमें अपने हक़ के लिए लड़ना ही होगा ,पर उसे पाने के लिए सत्ता के उस कुर्सी पर हमारी जनसंख्या का ज्यादा होना ही होगा | अब इंदिरा से भी सशक्त महिला इस देश को चाहिए क्योकि इस बार लड़ाई पाकिस्तान से नहीं ,अपने ही देश ,अपने ही समाज से है । पुरुषवादी सोच से है और शायद एक एक पुरुष से है ,अब समाज को सीता ,लक्ष्मी नहीं काली और चंडी चाहिए । अब अंत में एक बात जो मेरे मन में है कि अगर मैं इंदिरा होती तो अपने मौत के बाद',राजीव कि जगह अपनी बेटी को प्रधानमंत्री बनते हुए या अपना राजपाठ सँभालते देखना चाहुँगी आखिर क्यों नहीं
                                         ''एक लड़की हुँ ,हक़ से लड़की ही मांगुंगी ,
                                                                                    और अगर संसार त्याग माँगे
                                               तो सबसे पहले पति को ही त्यागुंगी |
    तो चलिए हक़ कि लड़ाई लड़े ,माँगे नहीं हक़ बनाये और मेरे साथ कहें
                                                          ''आओ चले घर से संसद कि ओर ''|
                       

CHAJJE CHAJJE KA PYAR

                                                    छज्जे छज्जे  का  प्यार 

आज  जहाँ  शहर  बढ़  रहे  हैं , वहीं  शहरों  में  मकान  और  उनके  बीच  कि  दूरियाँ  ना  के बराबर  हो  रही  है | 
 जहाँ  घरों  से आँगन  गायब  हो रहा है | वही घर  के  हर  तल्ले  पर धूप  और  रौशनी के लिये छज्जा तैयार है,वैसे ही जैसे आजकल का  नया बुखार इश्क़ जो हर किसी के सर चढ़ कर बोलता है।और इस बिमारी के लक्षण किसी महीने बढ़ भी जाते है|यहाँ हर आशिक अपनी आशिकी एक को दो बनाकर हिट करने के लिए बेताब हो जाता है|कुछ ऐेसी ही दास्ता ही लल्लन पाठक की | लल्लन पाठक जो यूँ तो कॉलोनी क्रिकेट का एक पसंदीदा खिलाड़ी है पर आजकल वह कॉलोनी में घूमते नज़र नहीं आ रहे | कॉलोनी वालों कि माने तो खिड़कियों और दरवाज़ों को चटकाने वाला अशांति फैलाने वाला देव दूत आज कल अपने घर में ही रहता है और कुछ दिनों से उसने और उसके दोस्तों ने रात को कॉलोनी को निशुल्क पहरेदारी प्रदान करना बंद करदिया है और सब के लवो पर एक ही सवाल है, आख़िरकार कहाँ है उनका अशांति दूत लल्लन ? आख़िर क्या हो गया उस आवारागर्द लड़के को, क्यों शांति है कॉलोनी में|
अगर जीवन एक फिल्म समझे तो,कैमेरे का एक एंगल लल्लन के छज्जे कि ओर करे तो पता चलेगा कि लल्लन पाठक अपना पूरा समय अपने किताबों को दे रहे हैं | और इस बदली हवा का कारण है सामने वाले घर में आई तिवारी जी की बिटिया शिवानी |  जिसे मन ही मन लल्लन चाहने लगा है और लड़की के सामने अपना रेपोरेट सही करने के लिए आजकल वह समय पर कॉलेज जाता है और हर शाम नियम से अपने छज्जे पर पढ़ाई करते दिखता है | जहाँ कैमेरे के एक एंगल से वह पढ़ते दिखाई देता है वही एंगल चेंज कर देखे तो पता चलेगा कि तिवारी जी कि बिटिया शिवानी के दर्शन का प्यासा दिखता है|आख़िरकार रोज़ छज्जे  पर वक़्त बिताने का नतीजा यह हुआ कि शिवानी कि नज़र उस पर पड़ ही गई और छज्जे छज्जे का प्यार परवान चढ़ने लगा|वही कभी कबार यह प्यार दोनों के घर वालो को देखकर छज्जे से झेंप जाया करती थी |
  आजकल वक़्त और इंसान दोनों कि फितरत मौशम जैसी हो गयी है,कब बदल जाये पता नहीं | लल्लन के प्यार भरे दिन और छज्जे छज्जे का प्यार परवान चढ़ने लगा और आया मौसम महोब्बत का , यानि फरवरी का  | बाज़ार लाल रंग से सज चुके थे ,दस रुपये का गुलाब पचास रुपये में अपना लाल रंग बिखेर रहे थे | चॉकेलट और टेडीबियर अलग ही अपना भावबढ़ाये हुए थे | वहीं आज बहुत से आशिकों को हज़ारो कि चपत लगने वाली थी ,पर कोई गम नहीं ,पैसे जाये तो जाये पर कमसेकम इस वैलेंटाइन के लिए प्यार न जाये | तो लल्लन भी किसी किमत पर अपने बदलते मौशम के प्यार को अपने मन कि बात बता देना चाहता है | और इस उधेड़बुन के साथ एक बार फिर लल्लन आज अपने दोस्तों के पास जा पहुँचा | कॉलोनी पार्क में एक बार फिर जमघट लगी और चर्चा का विषय था ''लल्लन के प्यार को इस वैलेंटाइन  पर क्या उपहार?''चर्चा शुरू हुई -
लल्लन :भाई सोच रहे है 'लाल गुलाब देकर सारी कहानी ही खत्म करे| कि इस बात का कटाक्छ करते हुए पप्पू बोल पड़ा :अरे भाई रिस्क ना लो,एक बार जो एप्लीकेशन रिजैक्ट हो गया तो दोबारा चांस मिले न मिले! मेरी मानो तो शुरुआत पीले गुलाब से करो| कि तभी छोटू पूछ पड़ा : गुरु लाइन तो क्लेयर है न ! तो लल्लन ने उतावला हो जवाब दिया,हाँ भाई दिखाया तो था तुम्हें ,कैसे वह रोज़ हमें देख कर मुस्कुराया करती है | आख़िर कार गहन तर्कवितर्क के बाद बिल पास हुआ की लल्लन पाठक अपने प्यार कि शुरुआत लाल गुलाब से करेंगे | जैसे तैसे रोज़ डे पर गुलाब छुप छुपाकर शिवानी के छज्जे पहुँचा,फिर चॉक्लेट और इस तरह कारवां , गुले गुलज़ार दिल बेताब दिन वैलेंटाइन तक पहुँचा| फिर पहले तो लल्लन ने शिवानी से कहीं बाहर मिलने का विचार बनाया पर किन्हीं कारणों से उसके सफ़ल न होने पर दोपहर दो बजे, जब सारी कॉलोनी आराम फ़रमाती है तब दोनोंने प्यार फ़रमाने का वक़्त रखा |
लल्लन पहले से छज्जे पर जा पहुँचा, पर हमेशा कि तरह लड़की देर से पहुँची, आख़िर कार इंतज़ार ख़त्म हुआ शिवानी को देख लल्लन कि आँखों में चमक दौर गई और वह अपने आप को रोक न सका | और वह इस छज्जे से उस छज्जे जा पहुँचा और घुटने के बल उसने अपने दिल कि बात शिवानी को बता दी | शिवानी कि हाँ सुनते ही मानो मौसम बदल गया और इस फिल्म का सीन चेंज होगया| लल्लन और शिवानी एक दूसरे में खोये हुए थे कि उन्हें तिवारीजी के आने कि आहट भी नहीं लगी| पर तिवारीजी इस फिल्म के विलन निकले और मौकयावरदात पर हाथों में प्यार के हथकंडो के साथ शिवानी और लल्लन धरे गए | वैलेंटाइन डे देखते ही देखते स्लैप डे में बदल गया मानो शारुख खान के मुहब्ते में सनी देओल का ग़दर चलने लगा और इस तरह प्यार का भूत परवान चढ़ने से पहले ही उतर गया |
 अब शिवानी इस कॉलोनी में नहीं रहती,अब वह पीछे के दूसरी कॉलोनी में रहती है | लल्लन का जीवन आज भी वैसे ही चल रहा है ,कॉलोनी में अब फिर अशांति है | क्रिकेट और पहरेदारी फिर शुरू हो गयी है क्योकि कॉलोनी वालो का अशांति दूत आबारगर्द लल्लन लम्बी बिमारी के बाद ठीक हो आया है | लल्लन अब कभी कबार शिवानी के कॉलोनी में भी चक्कर लगा आता है पर फिर भी जब जब उसकी नज़र सामने वाले छज्जे पर पड़ती  है तो,एक बार फिर उसके दिल में हिचकोले खाता है वह प्यार ''छज्जे छज्जे का प्यार ''|