होती सीमाओं से अकसर घुसपैठ है,
पर अब घरों में घुसपैठ हो रही है,
सीमाएँ ,बन्धनों और कुप्रथाओं की दीवार खोखली
करतीं है
कुछ घुसपैठिया औरत,
अजीब ही जंग लड़ती है यह घुसपैठिया औरत |
माँ के रूप में कुछ अपनी बेटियों को हथियार
चलाना सीखा रही है,
कुछ प्यार से तो कुछ चिल्ला कर, अपने शब्दों
से मन में घुसपैठ करती हैं
कुछ घर के द्वार और शहर की ऊँची ऊँची दिवार
फांद कर, गुसपैठ करती हैं,
अजीब ही जंग लड़ती हैं यह
घुसपैठिया औरत |
कभी प्यार से रोटियां बनाती हैं, कभी उसी तवे से
डिफेंडर बन जाती हैं,
चाकू का धार तेज़ कर, काली में बदल जाती हैं,
बड़ी ही तेज़ हैं ,यह बेबाक लड़ाको के फौज़ में
नहीं,
अकेले ही वार करती हैं,प्यार के बदले प्यार तो
कभी
वार के बदले वार, मार कर चली जाती हैं,
यह घुसपैठिया औरतें,
अजीब ही जंग लड़ती है यह घुसपैठिया औरत |
आँख ,नाक ,कान खुले
रखें यह मर्दानी समाज,
क्योंकि उनकी हर घटना
पर नज़र हैं,
तख़्त पलट कर कभी भी
राज़ कर सकती है
यह औरत, आपके ही आस
पास रहती हैं,
यह ज़िंदादिल, सत्ता की
प्यासी, नौ रूपों की मुरत
बड़ी ही अजीब, रक्त
रणजीत, लाल रंग उड़ाती आती हैं,
बड़ी अजीब जंग लड़ती हैं,
यह घुसपैठिया औरत |