‘’ओफ्कोउर्स आई लव यू’’
यूँ कभी सोचती हूँ कि एक
बिमारी जो आज मेरे हर दोस्त,मेरे आसपास लगभग हर किसी को हैं, वही मुझे और गरिमा को
क्यों नहीं है|कभी सोचती हूँ कि कॉलेज में इतने लड़कियों के होने के बावजूद गरिमा
में ऐसा क्या था जिसने उसके और मेरे बिच में अलग ही रिश्ता कायम कर रखा है|कई बार
सोचने पर मुझे उससे और मेरे मन से सिर्फ एक ही जवाब मिलता है,कि हमारी दोस्ती
इसलिए अच्छी हैं क्योंकि हम दोनों एक जैसे हैं,हमारी सोच एक डाल के दो चिड़ियाँ की
तरह हैं जिसे कोई चिड़ा उड़ा न पाया हो|
चिड़ा से याद आया एक बार मैं
भी फसने वाली थी| पर वह चिड़ा और मेरे बिच मेरे सेल्फ रेस्पेक्ट की दिवार थी,और आज
की मांग जैसे घंटो एक दूसरे से बातें करना,चैट करना,कहीं जाने और आने से पहले उसकी
डिटेल अदा करना और कभी न कर पाए तो झगड़ा और फिर क्या’’ओफ्कोउर्स आई लव यू’’यह सारी
बातें न करके उसे मेरे दुर्गा रूप का व्याखान मिल गया और बिचारा एक दिन बाद ही
मेरे डाल से नीचे उतर गया| आज कल समझ नहीं आता लोग फ्रेंड होते हुए भी पता नहीं
फिर क्यों किसी दिन पूछ लेते हैं,क्या आप मुझ से फ्रेंडशिप करेंगी? ये फ्रेंडशिप
शब्द अपने आप में ही बड़ा उत्तम दर्जे का शब्द है,जो उन्ही को समझ में आता है जो
इसमें लिप्त होते हैं| भैया ,हम तो गंगा किनारे वाले हैं, जिन्हें सिर्फ यारी और
दोस्ती समझ आवत है|
आज कल गर्लफ्रेंड और
बॉयफ्रेंड होना अपने आप में एक सोशल स्टेटस हैं जहाँ अगर किसी का इस सोशल साईट पर
पेज न हो तो लोग उसे या तो झूठा या फिर रेट्रो समझते हैं| आजकल मानो हर तरफ एक
बर्निंग ट्रेन चल रही हैं ,पार्टी हो या फेसबुक स्टेटस हर कोई सिंगल से डबल होने
की होड़ में हैं|इसके लिए हर तरफ,हर कोई महनत कर रहा है | कोई राहुल फेसबुक पर टाइम
इन्वेस्ट करता हैं तो कोई सीमा वात्शाप पर अपनी मैथ्स इम्प्रूव करती है,तो कोई
बंटी क्लास सिक्स से ही, इस मामले में सिक्सर मार कर अभी से ही सेफ खेलना चाहता
हैं मानों यह प्यार नहीं, प्रधानमंत्री जन धन योजना हो ,जिसमे जो जितनी जल्दी
अकाउंट खुलवायेगा वो उतना गौरान्वित फील करेगा| पर अपने लल्लन पाठक जैसे आशिक आज
भी वह परानी आशिकी को जारी रखते हुए, रोड़ रोमियो बनकर ही अपने जूलिएट को ढूंड रहे
हैं तो
उनके दोस्त लड़कियों के घर के बाहर से ही नाम पुकारकर,गालियों की रशीद पा
खुश हो जाते हैं|
प्यार की यह सभी कहानियां
मुझे अच्छी तो लगती हैं पर सच्ची नहीं| हम बीस के होते नहीं की बीस लोगों से सो
कॉल्ड रिलेशनशिप बना लेते हैं,और उस पर आशिकी और रान्झाना जैसे फिल्मों के भरी
भरकम डायलॉग दिए जाते हैं|पर इन सब पे मेरा तो एक यही डायलॉग है’’प्यार न हुआ की
यूपी.ए. सी का एग्जाम हो, जिसमे मानो यह लोग हर साल एक नयी कमिटमेंट और लड़की के
साथ ट्राई देते हैं और जब क्लियर कर पाते नहीं , फिर नए साल ,नए सब्जेक्ट यानी नई
लड़की के साथ ट्राई देने चले आते हैं|’’और अगर कोई डटा भी रहा हो तो उनमे मुझे एक
दूजे के लिए प्यार कम और अंधविश्वास
ज्यादा नज़र आता है|जैसे उसके पास मेरे लिए वक़्त नहीं रहा,वो कहीं किसी और के साथ
तो नहीं,इत्यादि| कुछ लोग तो जहाँ अपने माँ बाप के कहने पर नहीं बदलते, वो दो दिन
के प्यार के अकार्डिंग बदल जाते हैं,जैसे मेरी एक दोस्त अब जिन्स से सूट पर आ गयी
है,तो दूसरी को अब गुस्सा कम और प्यार ज्यादा आता है|मानो इनको प्यार नहीं
डायबिटीज हो गयी हो जिसमे इनकी सारी की सारी डाइट ही बदल गयी हो|
मैं यह नहीं कहती की प्यार
गलत हैं,पर हमारा तरीका शायद गलत है,जिसमे प्यार कम और लोग परेशां ज्यादा करते हैं
|प्यार कभी हमारी मज़बूरी नहीं होती,प्यार कमिटमेंट साथ रहने का नहीं साथ महसूस
करने का होता है| प्यार हमारे सिर्फ अच्छाइयों के साथ जीने से ज्यादा,एक दूसरे की
बुराईयों का साथ हैं|बार बार खबर लेने और देने से ज्यादा ख़बर रखने का साथ हैं और
हमारा ‘’प्यार’’,हमारी गर्लफ्रेंड और हमारा बॉयफ्रेंड होने से ज्यादा एक साथी होना
चाहिए, जिसके साथ रिश्ते टूट भी जाये तो लौट आने की उम्मीद हमेशा कायम रहे और जिसे हमें हर वक़्त कहना न
पड़े’’ओफ्कोउर्स आई लव यू’’|