Saturday, 11 August 2018

मेरे स्मृतियों का शहर......... ‘बांस का शहर’


मेरे स्मृतियों का शहर.........

                       ‘बांस का शहर’

           शाम को ऑफिस से आते वक्त जब मैं दिल्ली के ची-पों से दुखी हो जाती हूँ और मेट्रो की भीड़ भाड़ में मेरी आँखे थक कर झपक जाती है तो अक्सर मैं एक शहर को अपनी कल्पनाओं से देखती हूँ। उस सफ़र को फिर से जीने की कोशिश करती हूँ जिसके सफ़रनामे को लिखने के लिए मेरे शब्द कम पड़ जाते हैं। उस वक्त मुझे कोई ऐसा साथी नहीं मिलता जिसे मैं बिठा कर उन कहानियों को सुना सकूं। बता सकूं, उससे पूछ सकूं कि हे..... सुनो न! तुम कभी मणिपुर गए हो.....कोहिमा गए हो।  तुमने देखा है कभी उत्तर पूर्व के इस कोहिनूर को......

     पिछले 12 साल से मैं इस कोशिश में हूँ कि काश! मैं कभी इस शहर को लिखने लायक शब्द जुटा पाती...उतने ही सुंदर शब्द जितना सुन्दर मेरा वो शहर है....पर लखनऊ के दस साल और दिल्ली के 2 सालों में मेरे उन शब्दों में और कमी आ गई। रोज़ाना की दौड़- भाग में मेरा मन अशांत को दिशा भटक जाता है। दुनिया जब राजनीति, हिंसा और मानवाधिकार की बातोँ में खोई है तो मेरी आत्मा ‘बांस के शहर’ जाकर चुपके से सोना चाहती है......  

पर इससे पहले कि दिल्ली की व्यस्तता, जीवन में रोज घटित होती कहानियों और ऑफिस के बेतुके किस्सों में मेरा यह ‘बांस का शहर’ विस्मृत हो जाए मैं आज इसे लिखना चाहती हूँ

साल 2003-2004 ।।।।।।

  उन दिनों मणिपुर में थान्गजम मनोरमा देवी के रेप और हत्या के विरोध में मणिपुरी औरतें सड़कों पर उतर आई थीं। हमारे यहाँ आर्मी कैंट में सब्जी- फल ईमा लोग (ईमा- दादी या शायद माँ कहने के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द) बेचने आया करती थी। ईमा ने बताया करती थी कि बाहर के हालात बहुत बुरे हैं। लोग आर्मी वालों से नफ़रत करते हैं और हो सकता है कि कोई आर्मी वाला कैंट के बाहर बाज़ार में दिखा तो वे लोग उन्हें वही मार दें।
 

एक मंडे हमारी स्कूल बस बहुत रुक रुक के स्कूल के लिए जा रही थी। हमेशा की तरह मैं वक्त का फायदा उठा कर सो रही थी. बहुत देर बाद जब नींद खुली और अहसास हुआ कि अरे! स्कूल नहीं आया अभी तक... तो पता लगा बाहर प्रोटेस्ट चल रहा है और आर्मी गाड़ियों को नहीं जाने दिया जा रहा है.
 

कुछ देर बाद बस में बैठे बड़े भईया-दीदी की फुसफुसाहट से पता चला कि कुछ ईमा लोग इंडियन आर्मी के खिलाफ ‘न्यूड प्रोटेस्ट’ यानी नंगे हो कर धरना दे रही थी।
 
हम तब कर्नाटक के ‘बेलगाम’ से वहां आए थे। मैं वहां केन्द्रीय विद्यालय 2, लंगजिंग में कक्षा तीन या चार में पढ़ती थी। उस दिन मैथ्स का यूनिट टेस्ट भी था।  खैर, भगवान की कृपा से टेस्ट नहीं हुआ..... मैं बच गई थी क्योंकि रात भर के अथक प्रयास के बाद भी मुझे टेबल्स याद नहीं थे।  उस दिन शहर भले ही जल रह था पर मेरा बालमन टेस्ट कैंसिल हो जाने से बेहद आनंद में था।
                                                                               
 
 
 

 
 
मणिपुर कभी शांत नहीं रहा। हम वहां ज्यादा कहीं घूम भी नहीं पाते थे। कभी कभार मां हम तीनों को कैंट के अन्दर ही घुमाने ले जाया करती थी। कुछ रोचक खेलने की चीज जैसे छोटे वाले ‘रेसिंग कार’ या खाने की चीजें मां ईमा को लाने कह दिया करती थी और जब भी हफ्ते में एक दिन ईमा  आतीं तो हमारे लिए बाज़ार से वे चीजें ले आया करती थीं।
साल 2004 में जहां मणिपुर अफस्पा के विरोध में जल रहा था वहां बिहार में मेरे दादाजी की दिन दहाड़े, उन्हीं के स्कूल के सामने गोली मार कर की गई हत्या ने वैशाली जिला की नींद उड़ा रखी थी। बिहार में लालू- राबरी (राबड़ी देवी) का जंगल राज अपने उन्माद के अंत पर था। राज्य में दिन दहाड़े डॉक्टर, इंजिनियर, पत्रकार, आईएस- आईपीएस का अपहरण और हत्याएं हो रही थी और बस इंताजर था तो  राज्य में 2005 के चुनाव का। जनता ने नीतीश कुमार को लाने का मन बना रखा था और उधर मेरे पापा ने मणिपुर से पोस्टिंग का।

बहुत कोशिशों के बाद पापा को पोस्टिंग मिली पर नागालैण्ड...

 

 साल 2004-2005.....

   नागालैण्ड  की यादें मेरे बचपन की यादों का सबसे सुनहरा दौर था। यह शहर बेहद ख़ूबसूरत था और मणिपुर से शांत भी। इस शहर पर प्रकृति की बड़ी कृपा थी। नीला आसमां, पहाड़ों से कल- कल बहती ठन्डे पानी के छोटे झरने। आसमां में बादल छाते नहीं थे कि वो किसी पहाड़ से टकरा कर झड जाया करते। यहाँ दिल्ली में सावन भी नहीं बरसता और वहां पूरे साल सावन की झड़ी लगी रहती थी...

 

 

 
वहां सीढ़ीनुमा खेतों के बीच पूरा शहर बसा हुआ था। रात को हमारे क्वार्टर से पूरा शहर जगमगाया हुआ दिखाई पड़ता था। मानों पूरे शहर ने तारोँ से जड़ा चादर ओढ़ रखा हो और सामने के पहाड़ पर बसा हुआ ‘कैथेड्रल कैथोलिक चर्च’ उन सभी जगमगाते तारों में शहर का सबसे जगमगाता तारा था।

क्या दिन थे वे........आहा!

हमारा स्कूल के.वी. सी.आर.पी.एफ कैम्प, कोहिमा भी बहुत प्यारा था। एक पहाड़ पर प्राइमरी सेक्शनस  तो दूसरे पर सेकेंडरी सेक्शनस। वहां चारो तरफ पाम के पेड़ थे। छुट्टी में हमारी बस जब देर से आया करती तो हम लोग पाम खाया करते थे या वहीं का कोई खट्टा –मीठा जंगली फल।
 
                                        

शहर में ‘वॉर- समाधि’ थी और वो एक पुराना चर्च- ‘कैथोलिक चर्च’। बाकी वहां के कोहिमा गांव, जप्हू चोटी और त्योफेमा गांव काफी ख़ूबसूरत गांव थे जिसे देखने के लिए बाहर से पर्यटक भी आया करते थे। वहां हर कोई शांत और अपनी संस्कृतियों में डूबा हुआ था। क्रिसमस के दिनों में तो शहर और भी ख़ूबसूरत बन जाता था। पूरा शहर विभिन्न प्रकार के केक -पेस्ट्री के सुगंध से सुगंधित हो जाता था। लोग दो हफ्ते पहले से ही क्रिसमस कैरोल गाने लगते थे। बच्चे नाचा -गाया करते थे।

वहां बिहार और बांग्लादेश से आए बहुत से विस्थापित लोग भी थे। सब असमिया और बांग्ला में मिली जुली भाषा बोलते थे। मुझे याद है कि वहां मैंने औरतों को ही ज्यादातर काम करते हुए देखा था...चाहे कोई दुकान हो, व्यापार या खेती – किसानी आदि।

अब सबसे ज़रूरी बात जो मेरे लिए उस समय बहुत अनोखी थी वहां किसी रेल-लाइन का न होना। मुझे आज भी याद है कि पहाड़नुमा रास्ते पर हम कैसे बस से एक-दो दिन का लंबा सफ़र तय करके  दीमापुर पहुंचते थे। वहां से एक ट्रेन थी ‘बीजी एक्सप्रेस’, उससी से हम गुवाहाटी जाते थे और फिर वहां से ‘अवध आसाम एक्सप्रेस’ पकड़कर ब्रह्मपुत्र पार करते हए जलपाईगुड़ी और बरौनी होते हुए अपने घर हाजीपुर,बिहार पहुंचते थे।

उन दिनों महज़ तीन दिन के ट्रेन के सफ़र में ही ट्रेन की खिड़कियों से मैं नजाने कितने शहरों को झांकते हुए आती थी। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बीच मैंने कितने प्रकार के लोग, उनकी भाषा, खान-पान और संस्कृति को देखा था। अब जब कि मूल- संस्कृतियां विलुप्त हो रही है तो मेरा मन बार बार जाना चाहता है उस प्रदेश जहाँ, सावन साल भर का सिंगार था। मन करता है काश! कोई मुझे उसी देश ले जाए.....उस प्रदेश ले जाए जहाँ, बांस के फूलों से मैं खेला करती थी।

आज भी जब यहां दिल्ली में आकाशवाणी की खिड़कियों से मैं सूरज ढलते हुए देखती हूं तो मेरा मन उसी गोधूलि को देखना चाहता है। जहाँ पलाश के फूलों की झुरमुट छाँव तले सूर्य ढलता था और शहर तारो की चादर ओढ़, उस सर्द मौसम में बिना किसी साथी के... बांसुरी बजाते हुए गुमनाम सफ़र पर निकल जाता था...... आह! कितना सुन्दर था – मेरे स्मृतियों का वह शहर ‘ बांस का शहर’...

 
 

Monday, 3 April 2017

ABVP का बढ़ता सुरूर है, किसका कसूर है




पूरे देश में भगवा रंग का जलवा है| सेंटर से लेकर शिक्षण संस्थानों तक हर तरफ़ इसकी लहर है| बीजेपी की राजनीति का अपना ही दौर है| जहाँ इस दौर से हम छात्र राजनीति और ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्) को अलग कर नहीं देख सकते| स्वं संघ के इस छात्र संघ में आज 32 लाख सदस्य है जिसमें 9 लाख तो 2014 के ही मोदी लहर में पैदा हुए हैं| वैसे तो यह 1948 में ही बन गई थी| पर इसका भगवा रंग असल में मंडल आयोग के खिलाफ़, आरक्षण के खिलाफ़, सवर्णों की लड़ाई में गहराया|आपातकाल के दौर में इसने जहाँ इस काल को ख़त्म करने की लड़ाई लड़ी, वहीँ अयोध्या कांड में इसका तांडव देखने को मिला|आप माने न माने भारत में स्कूलों की चेन चलाने में राइट आगे है तो यूनिवर्सिटी के गेम चलाने में लेफ्ट|पिछले साल हैदराबाद यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी,जादवपुर यूनिवर्सिटी ,जेएनयू और इस साल दिल्ली यूनिवर्सिटी में जो हुआ, उसके बाद छात्र राजनीति वाद विवाद और विचार का मुद्दा बन गई है|

लोग समझने की कोशिश में हैं कि लेफ्ट और राईट की लड़ाई में ‘राइट’ और ‘रॉंग’ कौन है? क्या लेफ्ट इसलिए सही है क्यों कि वो हमेशा समानता और स्वतंत्रा की बात करता है? फ़िर राइट गलत कैसे है जो पहले राष्ट्र और फ़िर व्यक्तिगत राइट्स की बात करता है! तो सीपीआई ,सीपीएम और उनकी एसएफआई कैसे गलत हुई ?क्यों कि दबे कुचलों के लिए आवाज उठाना और आर्थिक रूप से उन्हें समानता दिलाने की बात कहाँ से गलत है|पर प्रश्न यह है कि क्या आज भी यह यही कर रहें हैं या सिर्फ राजनीति| ये सारे मुद्दे एक वक़्त के मुद्दे हैं पर उनपर हर वक़्त बहस करना और हिंसा कर लेना, कहाँ से सही हो सकता है|

1917 की रुसी क्रांति से लेकर फ्रांस सहित तमाम क्रांतियों को देखे तो पता चलता है कि क्रांतियाँ में छात्रों का एक बड़ा हाथ होता है| भारत में भी आज़ादी से लेकर बाद तक के बड़ी क्रांतियों को देखे तो उनमें छात्रों का हाथ रहा है|150 साल पहले दादा भाई नवरोजी ने सबसे पहले भारत में छात्र राजनीति की नीव रखी थी| तब वो लड़ाई का कारण लाहौर के मेडिकल कॉलेज में भारतीय छात्रों के साथ अंग्रेजों द्वारा भेदभाव करना था|वो लड़ाई राजनीति कम और छात्रनीति ज्यादा थी और अब राजनीति ज्यादा है और छात्र नीति कम| कभी पूरे भारत के छात्रों ने मिलकर AISF – आल इंडिया स्टूडेंट्स कांग्रेस फेडरेशन बना ‘चरखा स्वराज पहले फ़िर शिक्षा’ का नारा बुलंद किया था|वक़्त बदला और यही टूट टूट कर बिखर गया|कांग्रेस ने इसी से  NSUI –यानि नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाया|कुछ छात्र संघ नक्सलवादी क्रांति से उभरे तो कुछ दलितों के उत्पीड़न के लिए खड़े हुए| SFI जो CPI और CPM जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों का छात्र संघ है, उसका 1970 में मोटो था ‘स्टडी एंड स्ट्रगल’ पर आज ये सिर्फ स्ट्रगल करते ही दिख रही है| वैसे यह तमाम छात्र संघ की पैदाइश किसी अच्छे लड़ाई के लिए हुई थी और तब सभी का लगभग एक ही मोटो होगा ‘स्टडी एंड स्ट्रगल फॉर अ ग्रेट गोल’ पर आज सब स्टडी नहीं एक दूसरे के साथ ही स्ट्रगल कर रहे हैं,क्यों कि यह छात्रनीति नहीं राजनीति का दौर है|

यह बात आज सही है कि इस वक़्त लेफ्ट कमज़ोर हो रही है क्यों कि वो अपने मुद्दों को लेकर जमीन से नहीं युनिवर्सिटी की गलियों से ही सिर्फ लड़ रही है| वहीँ मोदी लहर के बाद राइट मजबूत हुआ है क्यों कि पाकिस्तान या आतंकवाद के खिलाफ़ और देश के अपमान में हमारे राष्ट्रवादी भावनाओं को अकसर ठेस पहुँच जाती है| यूनिवर्सिटी एक शिक्षण संस्थान है और शिक्षा का मतलब ही होता है- सारे बंधनों से जो हमें ऊपर ले आये| जात-पात,गरीबी-भूखमरी,उंच –नीच,और इंसानियत की और ले जाने वाला एक इकलौता ज़रिया यह संस्थान होते है| यही नीव होतें है बदलाव के|तो अगर आपको लोगों में राष्ट्रवाद पर उन्माद करवाना हो या समानता और स्वतंत्रता की लड़ाई सामान और स्वंत्रत लोगों में ही बैठकर कर करवाना है ,तो आपको शिक्षण संस्थाओं में पहले पैठ पाना होगा| और वही राजनीतिक पार्टियाँ कर रही हैं |राजनीतिक पार्टियाँ अपने एजेंडा पूरा करने के लिए इन्हें अपने रंगों में रंग रही है और ये छात्र मरने मिटने को तुले हैं| जो छात्र राजनीति में अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रहें हैं उनके लिए तो यह सब जरुरी है| पर उनका क्या जो यहाँ तमाम परेशानियों के बाद भी पढ़ने आयें हैं?

इन विचारधारा की लड़ाई से ऊपर उठिये|भूलिए मत कि एक्सट्रीम लेफ्ट और एक्सट्रीम राइट ने हमेशा दुनिया को लेनिन,स्टालिन,हिटलर और माओ जैसे लोग दिए है| जो अंत में हिंसा पर उतर आये| हिंसा ने उनके राष्ट्र हो ही नहीं पूरे मानव जाती को शर्मिंदा किया है| आप जिनकी लड़ाई लड़ने जा रहे हैं तो उनके पिछड़ेपन के ज़मिनीं कारणों को जानिय| आँख बंद करके लड़ना बेकार है| आप छात्र हैं| पढ़े लिखे हैं और आधुनिक है| तो आधुनिकता के आँगन में तमाम विचार सदा ही आमंत्रित होने चाहिए, भले ही आप सहमत हो या असहमत|हिंसा तो कहीं से इसका इलाज नहीं| तो लड़ाई अपने अस्तित्व बनाने की लड़िये न की सिर्फ राजनीति चमकाने की|

शिक्षा और ज्ञान दोनों ABVP, SFI,और NSUI जैसे तमान विचरों पर,उनके कामों पर, वाद विवाद कर प्रश्न चिन्ह लगा कर उन्मुक्त होने का ज़रिया है| ना कि मार पिट कर और अशांति फैला कर अस्थिरता फैलाने का तंत्र|                                         

                      

Tuesday, 24 January 2017

होतीं हैं ऐसी कुछ कहानियाँ



एक रात पढ़ कर, कई रात जागतें हैं लोग

होतीं हैं ऐसी कुछ कहानियाँ

आह! कहने तक की फुरसत नहीं देते

छोड़ जाती हैं बस कुछ नादानियाँ |

 

हम बेअदब थे, अदब सीखा गईं वो रवानियाँ

कहते रहें कुछ नहीं हुआ, हम ठीक हैं

फिर भी बीमार कर गई वो कहानियाँ |

 

जिनकी कीमत में आपके सालों साल हों

 एक पालें में खुद आप हो

खेल जातीं हैं जिंदगी ऐसी कुछ पालियाँ

निःशब्द कर देतीं हैं ऐसी अनगिनत कहानियाँ |

 

 

Wednesday, 19 October 2016

माँ मुझे मत बांधों


पैज़ेब ,पायल ,चूड़ियाँ तुमंने बना ली हैं ,

मुझे कंगनों  से मत लादो,

किसी स्वार्थी लक्ष्य से मत साधो ,

माँ मुझे मत बांधों |

 

माना कि मन मर्ज़ी मैंने कर ली है ,

विरासतों को तिलांजलि दे दी है ,

अपनी उम्मीदों से मत लादो,

माँ मुझे मत बांधों |

 

मुझे नहीं बनना किसी साजन की सजनी ,

न किसी राजन की रजनी ,

मुझे प्रेमी रहने दो ,

माँ मुझे मत बांधों |

 

छाती छुपाने के लिए दुपट्टा ओढ़ लूँ,

ससुराल में सर ढ़क लूँ ,

मुझे किसी पिअरी से मत बांधों ,

बोझिल सिन्दूर से मत लादो ,

माँ मुझे मत बांधों |

 

माँ क्यों तुम मुझे विदा नहीं कर देती,

मेरी अरमानों के आँचल में ,

तारे टाक कर,विश्वास कर लेती

मुझे स्वच्छंद नीलाम्बर घोषित कर दो ,

माँ मुझे मत बांधों |

 

कुछ न दो ,बिंदिया ,बिछिये से मत बांधों ,

दहेज़ की बोली से मत साधो

अरमानों से मत लादो

माँ मुझे मत बांधों |     

Sunday, 25 September 2016

शहाबुउद्दीन यानि - एके छप्पन, सैयां वीरप्पन ,बोल बा त मार देब गोली


        शहाबुउद्दीन यानि - एके छप्पन, सैयां वीरप्पन ,

                          बोल बा त मार देब गोली

शहाबुद्दीन जब जेल से निकाला तो बैकग्राउंड में बस इसी गाने की कमी थी |... एके छप्पन सैंया वीरप्पन  ,बोल बा त मार देब गोली .......बुआ कसम सच में क्या बमप्लाट सीन होता|

बारह साल बाद जब कोई कैदी जेल से निकलता है तो उसके चहरे पर कोई प्रायश्चित तो कम से कम होता ही है पर शहाबुद्दीन जेल से बाहर आया ऐसे ठसके से मानों संसद से सीधे दन दनाते चले आ रहे हों | मीडिया की मानें तो इस बाहुबली को लाने सौ सवा सौ गाड़ियाँ भी गयीं थी इससे पता चलता है कि बाहुबली बनाये नहीं जाते पालें जाते हैं |

शाहाबुद्दीन का नाम मई में सिवान के हिंदुस्तान ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन की हत्या के बाद उछला और अब उनके रिहा हो जाने के बाद मेरे इस लेख में |लेख में एक छोटा सा सुलेख आपलोग ई जानिय कि राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकारणी के सदस्य मोहम्मद शहाबुद्दीन को एक से लेकर दस साल तक की सजा ट्रायल कोर्ट सुना चुकी है | दो मामलों में आजीवन कारावास तक हुई पर अब उपरी अदालत में उसकी चुनौती के कारण फैसला वेटिंग लिस्ट में पड़ा है| फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले आने से पहले वो आज़ाद है | न्यायिक प्रक्रिया की स्पीड जितनी भी तेज हो पर मज़ा तो यह देखने में आयेगा कि लालू और नीतीश की इस प्रक्रिया में उंगली बाजी करने की स्पीडवा कितनी तेज़  होती है |

अजीब बात यह है कि  37 मामलों में शहाबुद्दीन के पेश न होने से ट्रायल शुरू नहीं हुआ पर हाई कोर्ट में एक के बाद एक मामले में जमानत शुरू होने लगी | शहाबुद्दीन जब अन्दर हुआ तो सत्ता में बीजेपी और जेडीयू थी और आज जब बाहर हुआ तो राजेडी और जेडीयू  और मुख्यमंत्री बोले तो अपन के नीतीश बाबू| जेल से निकलते ही लालू के सैंया वीरप्पन बोले लालू ही हमारे नेता है और होना भी तो चाहिए क्योंकि चोर चोर मौसेरा भाई |

बिहार की राजनीती यहीं समझ में आती है | अनन्त सिंह को नीतीश नहीं छोड़ते और शहाबुद्दीन को गिरिराज ,और उधर अमित शाह बनाम शहाबुद्दीन का एक और बकलोली मैच उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव व बीजेपी खेल रही है| कुल मिलाकर शहाबुद्दीन बिहार की राजनीती में हिट चल रहे हैं| मुद्दा अभी और उछलेगा, नितीश और मूक रहें शायद पर प्रश्न यह है कि शहाबुद्दीन जो एक भयावह दौर का प्रतीक रहा है कोई अब यह नहीं देखेगा कि बिहार के मुसलमानों ने भी शहाबुद्दीन को गिरा ,लालू के ख़िलाफ वोट किया था अब सब यह भूलकर यही सोचेंगे कि नीतीश के तथाकथित मंगल में अब क्या नया जंगल होगा ? धुर्वीकरण की राजनीती अब किस ओर जाएगी? पर फ़िलहाल वही दौर याद आ गया ,’’ शहाबुद्दीन – यानि एके छप्पन सैंया वीरप्पन ,बोल ब त मार देब  गोली’’            

Monday, 8 August 2016

shamshaan

रात ढलती जा रही है ,
मानों कोई राह हो, शहर से  शमशान तक
शाम ढलती जा रही है ,
शहर से शमशान तक |
  वह चादर हर शाम मुझे उढाता है ,
  मानों , जाना है मुझे  शर्द में विरान तक ,
  दिल ठहरता जा रहा है ,कट रहा है रास्ता, शहर से शमशान तक|
अब शिकायतें मायने नहीं रखती ,
बेअसर है दुआ रहनुमां तक ,
यह लोग बदलते जा रहें हैं ,
सब सफ़र में हैं ,
शहर से शमशान तक |
   विरान ,शमशान बड़े शान से बढ़ रहा है |
   मतलबी इंसान तक ,
   भयभीत तन सिकुड़ रहा है ,
 मानों यात्रा में है यह शहर , शहर से शमशान तक |
 
 

Saturday, 2 July 2016

गंतान्त्त के आगे


हमारा प्रेम अब गतांक के आगे का प्रेम हो चला है| जैसे एक प्रेमी या पति या पत्नी के साथ जो गत अनागत साल के बाद का तलाक उसके बाद एक नयी शुरुआत यानी गतांक के आगे |......

पिछले दिनों मैं ‘द हिन्दू’ अख़बार में एक लेख पढ़ रही थी जो की इन दिनों तलाक  के बढ़ते केस पर लिखी गई थी | भारत में रोजाना 100 डिवोर्स केस फाइल होते हैं | अमेंस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस सालों में भारत में डिवोर्स के केस में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है| अजीब बात तो यह हैं की यह केसेस घरेलु हिंसा या दहेज़ पताड़ना के कारण नहीं है | रिपोर्ट के अनुसार ये केस लोगों में आपसी भरोसे के कम होने ,एक दूसरे के माँ बाप की ज्यादा दखलांदाजी,या उनकी अवहेलना या अनादार करने के कारण बढ़ रहे हैं ,और सबसे बड़ा कारण  कम अवधि के प्रेम के बलबूते अपना अवधपुरी बसाना और वक़्त के साथ बेवक्त होते एगोइस्टिक झगड़े करना  और क्या विरह यानी  रिश्ते का स्वाः|

यह सच भी है . इन दिनों मेरिटल अफेयर्स जैसे वाहियात शब्दों ने रिश्तों हो गंधौला कर दिया हैं . अपने आप को देखिये हमारा प्रेम अब आशिकी 2 ,से 2 स्टेट होते हुए हाफ गर्लफ्रेंड हो चुका है | प्यार प्राइड and प्रेज्यूडिस से होते हुए , लव हैपन्स ट्वाइस के रास्ते हेट स्टोरी बन कर रह जाती है और हम कहते हैं “ I TOO HAD A LOVE STORY”. हमारे प्यार का भी devaluation हो गया है .ऐसा लगने लगा है की हमारे रिश्तों में भी सावधान इण्डिया,एकता कपूर का ड्रामा चल रहा हैं | सच में भारत में असहंसुत्ता बढ़ गई है और कानूनों का इस्तेमाल होने लगा हैं |पीछले  दिनों हमारे चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया के आँखों से पेंडिंग केसों ने आशुं निकाल दिए और ऐसे ही लोगो के डाइवोर्स केस बढ़ते चले गए तो मुझे लगता है  कुछ दिनों में सभी कोर्ट के जज भी रो देंगें | दुनिया की छोड़िये क्या ऐसे लोगों को अपने बच्चों पर भी दया नहीं आती |नजाने क्या हो रहा है हम ज्यादा पढलिख गए हैं, आज़ाद हो गए है या सभ्य बनकर सभ्यता की भयता बढ़ा रहे हैं | टैगोर के जोगर बाली की प्रेमिका अब शायद दुनिया में कहीं नहीं रहीं. धर्मवीर की सुधा और चंदर सा गुनाहों का देवता दुनिया में शायद ही कही हों , न हमरा प्यार हमारा विश्वास हैं, न हमारी हिम्मत, और न विरह हमारी प्रेरणा | हमारा प्रेम आज स्टेटस का मोहताज है, किसी मुकाम का मोहताज है, जो किसी मुकाम से शरू होता है और किसी मुकाम पर जा कर खत्म हो जाता है | प्रेम तो कभी अकड़ की कहानी न थी,यहाँ तो बस झुकाव ही झुकाव होता है .कोई शर्त नहीं होती ,न कोई स्वार्थ | सच में हम खोखले हो गए हैं |  

अब कोई कहा गाता है वह गीत कि’’ बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने ,हमारी थोड़ी से बेवफाई ‘’|अब तो लोग अकसर “पिया न रहे मनबसिया “गाते नज़र आते हैं | वाह रे दुनिया ! विरह को भी अपना व्हात्सप्प का स्टेटस बना डाला | अनुभव के आँगन में आधुनिकता को जगह मिलनी चाहिए पर ये क्या? ऐसी आधिनुकता का क्या फायदा की हम ही खोखले नज़र आयें . अपने रिश्तों को बनाते हुए सोचिये ,वक़्त लीजिये , जरुरत पड़े तो थोड़ी अच्छी फिल्में भी साथ में देख लीजिये , कुछ किताबे झांक लीजिये, सफल जोड़ों की जिंदगी ताक लीजिये | विरह की तकलीफ महसूस कर लीजिये अपने अच्छे दिनों को याद कर लीजिये | माँ बाप और दोस्ती दुनिया के तर्क और वितर्क को तक्किय के नीचे डालिए|  पैसे से ज्यादा प्यार को तवज्जू दें क्यों कि हर चीज की एक लागत होती है और प्रेम की लागत ज्यादा कुछ नहीं  बस कुछ साल, दो मुठ्ठी विश्वास हैं और गंतांत के आगे मिलने की ज़िद|