रात ढलती जा रही है ,
मानों कोई राह हो, शहर
से शमशान तक
शाम ढलती जा रही है ,
शहर से शमशान तक |
वह चादर हर शाम मुझे उढाता है ,
मानों , जाना है मुझे शर्द में विरान तक ,
दिल ठहरता जा रहा है ,कट रहा है रास्ता, शहर से शमशान तक|
अब शिकायतें मायने नहीं
रखती ,
बेअसर है दुआ रहनुमां तक ,
यह लोग बदलते जा रहें हैं ,
सब सफ़र में हैं ,
शहर से शमशान तक |
विरान ,शमशान बड़े शान से बढ़ रहा है |
मतलबी इंसान तक ,
भयभीत तन सिकुड़ रहा है ,
मानों यात्रा में है यह शहर , शहर से शमशान तक
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