पूजा ने सुबह उठते ही
उनींदी आँखों से बेड से नीचे पैर रखने से पहले की एक बेड सेल्फी ली,और उसे फेसबुक
और वात्सेप पर अपलोड कर दिया,फिर क्या कमेंट्स,लाइक्स,क्रिया प्रतिक्रिया,वाद
विवाद,सॉरी –थैंक यू आदि का दौर तब तक चला जब तक पूजा की दूसरी सेल्फी न आई |
यह कहानी सिर्फ पूजा की नहीं रही ,अब यह कहानी पूजा जैसी कई
लड़कियों,नौजवानों और बड़े की हो गयी है|किसी आम आदमी की बर्थडे पार्टी हो या किसी
ख़ास जैसे मिस्टर और मिस्सेस ओबामा,प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी,या फिर शाहरुख़ ,सलमान,दिपिका,कटरीना
जैसे हस्तियों के विशेष पल,इन सभी पलों में कम
से कम एक सेल्फी तो सभी लेते हैं|
आखिरकार यह सेल्फी है
क्या?२०१३ तक गुमनाम अदने से शब्द में ऐसा क्या था जिसने ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी में
तो जगह पाई ही,वही ‘’वर्ड ऑफ़ द ईयर’’का ख़िताब जीतते हुए इस साल पूरी दुनिया में छा
गयी|यहाँ तक की इस सेल्फी मेनिया से तो जानवर भी बचे न रह सके| इंडोनेशिया के एक
वाइल्ड फोटोग्राफर ने कुछ पल के लिए अपना कैमरा क्या खुला छोड़ा,एक बन्दर ने मौका
पाते ही अपनी परफेक्ट सेल्फी खींच ली|
वैसे तो इस ‘’सेल्फ’’
द्वारा ली गयी ‘’सेल्फ पिक’’=सेल्फी के फ़ायदे अनेक हुए हैं |और अगर आप इसे अच्छी
तरह समझना चाहते हैं तो,अपने किसी पुराने एल्बम को अपने किसी सोशल नेटवर्किंग
साइट्स पर बनाये एल्बम से तुलना कर देखना चाहिए|
इस से आपको पता चलेगा कि
पहले जहाँ वर्मा जी फोटो
खिंचवाने के लिए पड़ोसी शर्मा जी को ढूंढा करते थे वही,आज पूरा परिवार एक ही फोटो
में समाकर अपनी तस्वीर खुद ही खींच लेता है|पहले जहाँ एक फोटोशूट से पहले ढेर सारी
फॉर्मेलिटी होती थी,आज वो कुर्सी और पीछे का सुन्दर बैकग्राउंड गायब हो चुका
है|वर्माजी की छोटी बिटिया सीता को अपनी दोस्त गीता के साथ सज धज कर,अब स्टूडियों
नहीं जाना पड़ता और ना ही एक तस्वीर के लिए सीता और गीता को घंटों होंठ सुजाने पड़ते
है,अब तो सीता और गीता ऐसे होठ निकाल निकाल कर फोटो खींचती है जैसे मानो बिना
स्ट्रॉ के कुछ चुसने की कोशिश कर रही हो|यही नहीं शर्मा जी के बेटे ने तो यो यो के
स्टाइल में आरे तिरछे फोटो को ही अपना प्रोफाइल पिक बना रखा है|
सेल्फी ने फोटोग्राफी के
कल्चर को एक नया मुकाम दिया है,उसे एक नयी पहचान दी है|जहाँ अब एक फोटो से पहले की
गयी घंटो तैयारियो को अब छुट्टी मिली है,वही हमारे हर पलों को विशेषता|अब लोग जब
खुश होते हैं ,जहाँ खुश होते हैं ,जिस हालत में खुश होते हैं,वहीं अपनी सेल्फी
खींचकर अपनी ख़ुशी का इज़हार पूरी दुनिया से कर देते हैं|सेल्फी के आने से इसी तरह
सिटिज़न जर्नलिज्म को भी एक नया मुकाम और मदद मिली हैं|
सेल्फी ने सबकुछ बदला पर इन
सबके बावजूद सेल्फी ने कही किसी को अवसर दिया है तो वहीँ उन अवसरों की यादों को भी
काम कर दिया है|जहाँ फोटोग्राफी का एक अपना ही लम्बा सफरनामा रहा है,जहाँ परफेक्शन
की एक परिभाषा थी,बैकग्राउंड,एंगल्स,एक्सप्रेशंस,रंगों और कपड़ो का चुनाव एक महत्व
रखता था वहां आज सेल्फी के आते की यह सब दर्किनार हो गए हैं|उदहारण स्वरुप जैसे-
वह मिसेस शर्मा का लाली ,लिपस्टिक,काजल और साड़ी चुनने में विशेष समय देना,और एक
लम्बे घूँघट के साथ वो शर्मा जी और बच्चों के साथ खींचवाया गया फोटो आज भी मिसेस शर्मा को जहां दिन,दिनांक
के साथ याद है वही उनके बच्चे आज अपनी इतनी सेल्फी ले चुके हैं की उन्हें यह याद
ही नहीं कि उन्होंने कौन सेल्फी कब ली
थी?अब तो यह मंज़र है कि सेल्फी पसंद आये न आये,फोर्मिलिटी में ही उसे लाइक करते
करते हाँथ दुःख जाता है|अब तो हमारी वाहियात सी सेल्फी भी एक प्रसिद्ध सेल्फी बन
जाती है और इन सब पर चार चाँद लगाती है एडिटिंग सॉफ्टवेयर और हमारे आधे अधूरे
शब्दों से बने अधूरे वाक्य|पहले तो लोगो ने एडिटिंग कर अपने ना पसंद लोगों को ही
फोटो से एडिट किया, पर अब तो आलम यह है की
लोग अपने ही अंगों को ही एडिट कर सेल्फी लेते हैं|अब तो ऐसा लगता है जैसे मानो
लोगों ने रिश्तों में भी चीनी की जगह सुगर्फ्री इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है
,वैसे ही जैसे फोटो में अपने चाहने वालों की जगह अपना सेल्फ सेंटर्ड अयेतितुड
घुसाकर सेल्फी का इज़ात कर लिया|
लोग सही ही कहते हैं कि
किसी चीज़ का ज्यादा होना भी,उसे खास से आम बना देती है,वैसे ही जैसे हमारी अनगिनत
सेल्फी|आज भी हमारी पुरानी एल्बम की हर फोटो ज्यादा ही बोलती हैं बशर्ते हमारी अनगिनत सेल्फिस|हमारी पुरानी फोटों की यादें
जहाँ हमें बेशुम्हार प्यार और होठों पर भीनी मुस्कराहट देकर शांति देती है, वही
शायद किसी सेल्फी पर लगायी ठहाके की आवाज नहीं देतीं|
पर इन सबके बाबजूद हमें
मानना ही होगा कि सेल्फी आज की मांग है,बदलते वक़्त की पहचान और ऑय विटनेस
हैं|जिसने हमें और फोटोग्राफी को एक नया ट्रेंड दिया हैं,
वह ट्रेंड जो आपको बना दे’’कैन
अग्ली,लुक लवली’’|