Wednesday, 17 September 2014

हे इश्वर! तुने ऐसी प्रतिमा बनायीं क्यों


यूँ तो तुम से मेरी कुछ खास बनती तो नहीं,

पर आज तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ,

मेरी आँखें वैसे कुछ गलत बर्दाश्त करती तो नहीं,

और ना ही मुझे माँ पापा ने झुकना सिखाया है,

पर आज तुम्हारे सामने मैं एक संदेशवाहक बनकर आई हूँ,

 तुम तक उनका सन्देश लायी हूँ,

जो तुम्हें मानते हैं, और जानने का दावा करते हैं,

तो सुनों,

 

हे ईश्वर!,||हे बेदर्द ईश्वर||,

रोज़ -रोज़ तेरे दर पर मैं आई क्यों,

हे ईश्वर, आशीर्वाद में तू ने दुःख ,वेदना भिजवाई क्यों,

तू ने ऐसी गुड़िया बनायीं क्यों,

रोज़-रोज़ तेरे दर पर आई क्यों?

 

  हे ईश्वर, हे पत्थर की मुरत,

तू ने पैसे देकर बिकने वाली,

धैर्य की कठपुतलियाँ बनायीं क्यों?

ऐसे बाबुल घर भिजवाई क्यों,

ऐसे साजन से मिलवाई क्यों,

इतनी वेदना किस्मत में लिखवाई क्यों,

हे देवता, तू ने हमें लड़की में जनाई क्यों?

ऐसी प्रतिमा बनायीं क्यों?

|||हे ईश्वर|||तू ने ऐसी प्रतिमा बनायीं क्यों ???

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