Friday, 21 November 2014

रात पश्मीने की


बेफिक्र, बेसब्र,दिन यूँ ही ढलने लगी हैं.

रात पश्मीने की अब चढ़ने  लगी हैं|

               फिर उन सड़को पर उगते और ढलते सूर्य के साथ,

                 धुंध चढ़ने लगी है, हवाओं में ठंढ बढ़ने लगी हैं,

                     रात पश्मीने की अब चढ़ ने लगी हैं|

     रामू काका की चाय में अदरक के स्वाद, घुलने लगी हैं,

    धीरे धीरे माँ की चादर सर ढकने लगी हैं,

    मौका मिलते ही रजाई में किसी के गरम पैरों को,ठंढे पैरों से सुला देना,

    यह शरारत बढ़ने लगी हैं, 

     रात पश्मीने की चढ़ने लगी हैं|  

हाफ से फुल,फुल से बंद गले तक स्वेटर बढ़ने लगी हैं,

गुलाब की खाली डालियों में ,कलियाँ उभरने लगी हैं,

पत्तियां  सिकुड़ने लगी हैं,

और शाम के वक़्त,पकौड़े तलने वाली की कमी खलने लगी हैं,

ठंडी हथेलियों को,गर्म हाथों की कमी लगने लगी हैं ,

आँखों की नमी छलकने लगी हैं,

रात पश्मीने की चढ़ने लगी हैं|

                 कभी अलाप के सामने बैठ,मूंगफली के छिलके बिखरने लगी हैं,

                    हाय ! ये सर्दी दिल को निकम्मा करने लगी हैं,

                   यह साल के ख़त्म होने का अल्टीमेटम देने लगी है,

                   उफ़ ! ये रात पश्मीने की, चढ़ने लगी हैं|

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