Sunday, 26 July 2015

ठुल्ला थानेदार


               ठुल्ला थानेदार

सोचिये कल को केजरीवाल दिल्ली पुलिस को कुछ काम दें ,और सामने से जवाब में लिख कर आये “ बाबा जी का ठुल्लू’’ या “ठुल्ला जी का ठुल्लू’’.

तो आलम कितना गजब का होगा न. केजरीवाल ने एक निजी चैनल के इंटरव्यू में दिल्ली पुलिस को ठुला कहा है . तो इस मे गलत क्या होगा अगर दिल्ली पुलिस केजरीवाल को “ बाबा जी का ठुल्लू’’ पकड़ा दे.

कुछ भी हो यह शर्मनाक है . केजरीवाल ने शब्दों की गरिमा को लांग दिया है . हर दुसरे तीसरे दिन वो किसी न किसी को भ्रष्ट्राचारी ,चोर ठुल्ला आदि बता देते हैं . इससे मालूम होता है की उनकी शब्दिता से लिहाज और तमीज दोनों ही शब्द गायब हो गए हैं .

दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस के बीच शुरू से ही टकराव है. केजरीवाल की मांग है की दिल्ली पुलिस उनके अन्दर आ जाये पर संवैधानिक रूप से तो दिल्ली पुलिस उपराज्यपाल, प्रधानमंत्री और संसद के अन्दर आती है .

केजरीवाल का कहना एक हद तक सही भी है . हालही में हुई लड़की की मौत और पूरी घटना में पुलिस की लापरवाही जरुर थी .दिल्ली में होते अपराधों की जिम्मेदारी उनकी भी है.पर इसके लिए पुलिस वालों को ठुल्ला कहना एक मुख्यमंत्री के लिए अशोभनिय है .

केजरीवाल हमेशा से अपने आप को परम्परागत राजनीती के नेताओं से अलग बताते है. शायद इसीलिए भी उनके निंदा करने का तरीका और शब्दों का चुनाव भी अतुल्यनिय है.

तो केजरीवाल को अब आगाह हो जाना चाहिए . कही ये ठुल्ले वक़्त वक़्त पे उन्हें  “बाबा जी का ठुल्लू’’ न पकड़ा दें.

   

 

मिले सुर मेरा तुम्हारा


             मिले सुर मेरा तुम्हारा

कल चिड़ियों का एक दस्ता बड़े लय और ताल में उड़ा जा रहा था . मैंने पूछा ये किस लयताल में.कहाँ की ओर चले ? तो कहने लगे

“मिले सुर मेरा तुम्हारा की लयताल पर , बिहार चले .”

चिड़ियों का यह कहना गलत नहीं है .बिहार इस समय चुनाव रूपी उत्सव की ही तैयारी में हैं . बिहार का हर चौक चौराहा ,हर चाय पर चर्चा , चुनावी दाव पेंच से सराबोर है .वही सभी दलों ने भी अपनी अपनी कमर कस ली है.

जनता दल , राजद ,राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी का यह महाविलय ,नितीश कुमार के सुशासन के दावों पर चुनाव लड़ेगी. वही बीजेपी 160 हाईटेक रथ चलाएगी जी जीपीएस प्रणाली से लैस हो बिहार में बीजेपी के परिवर्तन का प्रचार करेगी.

हाल ही में संपन्न हुए विधान परिषद् चुनावों में बीजेपी को मिली सफलता से जहाँ उनमें जोश और उम्मीद है ,वहीँ अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाय रखना नितीश और लालू के लिए चुनौती .

गौरतलब है कि बिहार की राजनीती में जातिगत समीकरणों का अभी भी बहुत महत्व हैं . लालू इसके घाघ खिलाडी हैं तो अमित शाह भी इस खेल के परम पंडित है . अब देखना यह होगा की बिहार किसे चुनता है . विकास को या जातिगत विरासत को. और इस छठ में किसकी गीत सुनाई पड़ती है, कौन सा राग बजता है? भाजपा का या महागठबंधन का सुर “ मिले सुर मेरा तुम्हारा’’.

  

 

Saturday, 25 July 2015

पहरुए सावधान रहना


              



 पहरुए सावधान रहना

उन दिनों  नीले आसमान का वह नीला सूरज अजीब ही भयंकर प्रतीत हुआ करता  था . वक़्त के उस पहर में आसमान से जमी तक बस एक ही रंग पसरा हुआ था नीला. बाग ,बगीचे से लेकर बागवान तक सब नीले थे और नील थी इन बगीचों की पैदावार.

ये दौर था चंपारण का , बिहारियों के नील सागर में डूबने का दौर . इस दौर में नील ने उनसे उनका सब छीन लिया था, घरबार , सुख चैन यहाँ तक की उनकी माँ, उनकी जमीन भी . माँ को बचाने की जंग में ही कितने बलि चढ़ गए पर माँ वापस न आई क्यों कि नील के ठेकेदारों के लिए वह गिरवी थीं और इस माँ के बेटे कर्जदार .

स्वतंत्रा की लिपि में लिखते हुए बाइस्कोप की दृश्यों की तरह वो दृश्य सामने चल पड़े हैं . वो दुःख,वो पीड़ा ,वो आक्रोश,वो बलिदान सब याद आ गया . आज राम प्रसाद बिस्मिल की वही विपल्व गायन याद आ गया,कि

 “ कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ की उथल पुथल मच जाये , एक हिलोर इधर से आये एक हिलोर उधार से आये”.

स्वतंत्रा की इस कहानी मे वेदना थी, विडम्बना थी ,वैभव था ,विरोध था तो विराग और वियोग के गीत भी थे . अमर होने वालों के नाम हमारे मुख्य पृष्टों पर सदैव रहेगा पर अमरता की इस आड़ में को बलि चढ़ गए उनका क्या ? क्या हुआ उन बंधुआ मजदूरों का ,गिरमिटिया का , श्रमिकों का जिनका आक्रोश ही इस संग्राम की जनिनी थी .

 मैं  बात कर रही हूँ उस गिरमिटिया प्रथा की जिसने १९१३ से १९१४ में लोगों से उनके अपने छीन लिए . अपने देश छुडवा दिए वो भी सिर्फ थोड़ी सी मजदूरी के लिए . पूछिए कि उनकी क्या गलती थी जो अंग्रेजों ने उन्हें गिरमिट बना कर पञ्च बरस या इससे कम की मजदूरी के इकरारनामे पर दस्तखत करवा उन्हें विदेश में मजदूरी करवाया . सिर्फ तिन पोंड मिलने वाली मजदूरी ने इन मजदूरों श्रमिकों की जान ले रखी थी . उनका घर बार ,जमीं जायदाद , सुख चैन सब को अपने अधीन कर उन्हें पराधीन बना दिया था . क्या इन्ही मजदूरों ने अंग्रेजों का व्यवसाय के बदले पराधीनता स्वीकार करने की हामी भरी थी . करारनामा तो राजाओं ने किया था . अपने फायदे के लिए सन १६०० में कुछ गज जमीं दी थी और धीरे धीरे दमक की तरह कितने गज जमीन खा गए .

हम कैसे भूल सकते हैं नील का वह धब्बा जिसने रजा जनक की भूमि चंपारण को बाँझ बना गयी . जो जमीं कभी सीता की जनिनी हुआ करती थी अब वो नील के अलावा कुछ और पैदा करने लायक न रह सकी . चंपारण में जैसे आम के वन हैं, वहां सन १९१७ में नील के खेत थे . चंपारण में किसान अपनी ही जमीं के 3/ २० हिस्से में नील की खेती ,उसके असल मालिक के लिए क़ानूनी रूप से करने को मजबूर थे .  तो तिनकठिया कौन था ? वो जमींदार या वो राजा जिनका कोष भी इनके राजस्व से भरता था . इतिहास गवाह ही इस बात की आन्दोलन अशंतोश , आक्रोश से पैदा होती है और राजों ने कभी आन्दोलन नहीं किया है .

असंतोष तो उन दिनों कलकत्ता ,गुजरात , यूपी और बिहार के मजदूरों में भी था . जहाँ गांव के बच्चे मारे मारे फिरते थे या माँ बाप दो तीन पैसे की कमाई के लिए उनसे पूरे दिन नील के खेतों में मजदूरी करवाया करते थे . उस समय पुरुषों की मजदूरी वहां दस पैसे ,महिलों की छह तो लड़कों की तीन पैसे से अधिक नहीं थी .  तो दुःख गाथाये किसकी थी इन लोगों की या इनके पैसे पे जीने वाले राजाओं और जमींदारों की . वो तो भारत भूषण पंडित मालवीय जी जैसे आम लोग थे ,जिन्होंने नेटाली गिरमिटियों पर से तिन पोंड का कर सन १९१४ में रद्द करवाने के बाद. भारत में इसके लिए आवाज उठाई और अतः एक बड़ी लड़ाई लड़ने के बाद ३१ जुलाई १९१७ में यह ख़तम कर दिया गया .

ऐसे ही नील का धब्बा धोने वाले राजकुमार शुक्ल कोई जमींदार नहीं थे बल्कि एक किसान थे . जिन्होंने गांघी जी को बिहार ले जाकर वहां की दशा दिखाई . बिहार समेत देश से कई स्वमसेवक इकट्टा हुए जिनमे राजेंद्र प्रसाद,अवान्तिकाबाई गोखले ,आनंदी बाई ने क्रांति की शुरुआत की . इस क्रांति से किसानो से लेकर पट्टीदार तक में स्वतंत्रता की भावना जागृत हो गई. और इस तरह एक बड़ी लड़ाई का परिणाम ये था की सन १८६० में नील की खेती बंद कर दी गयी .

खेडा सत्याग्रह भी ऐसे ही एक क्रन्तिकारी घटना थी . खेडा के दो मजदूर मोहनलाल पंड्या और शंकरलाल पंड्या का पत्र गाँधीजी को मिलते ही वह ठेदा की ओर चल पड़े . खेडा में फसल बर्बाद हो गयी ही थी  और सरकार लगन माफ नहीं कर रही थी  . इसका परिणाम यह हुआ की गाँधी जी ने खेडा में सरदार वलभ भाई पटेल ,अनसुइया बाई ,शंकर लाल बैंकर के साथ मिल कर सत्याग्रह शुरू किया. उन दिनों अहमदाबाद ,कठियावाड, बारडोली में मील में कम करने वाले मजदूर, मिल मालिकों की मनमानी से परेशां आ गए थे. उस वक़्त गाँधीजी  ने खादी का आह्वाहन किया. चरखा चले और इसी तरह नमक कानून तोड़ ,घर में ही नमक तैयार करके लोगों ने अंग्रेजों की असहयोग शुरू हो गई. असहयोग बढ़ता गया . और आखिरकार सबकी महनत रंग लायी असहयोग सफल हुआ और तब भरता छोड़ों आन्दोलन ने अंग्रेजों को भारत से उखाड़ फेंका . १५ अगस्त १९४७ में भारत आज़ाद हुआ.

यह आज़ादी असल में हमारी कभी नहीं थी .भले भी गाँधी जी इस मशाल की आग थे पर ये आग छोटी छोटी जिन लपटों से बनी थी वह,खेतिहर किसान थे,मजदूर थे,और गिरमिट थे. किसानों ने जहाँ इसकी बीज बोई,मजदूरों ने महनत की और बुनकरों ने यह भारत हमें बुन कर दिया और जिन लेखकों ने इस आज़ादी को बोल दिए उन्हें मेरा सलाम . तभी कवि गिर्जाप्रताप ने हमसे कह्गये

   “आज जीत की रात पहरुय सावधान रहना,

    दीपक सामान रहना ,खुले देश के द्वार ,

    पहरुय सावधान रहना |”


Friday, 8 May 2015

मैं रोती हूँ, तू सुन

हे समाज के महा पुरूषों,
मै चिल्लाती हूँ तू सुन,
मैं रोती हूँ,तू सुन।

  हे पाँचजन के रघुराई,
 हे समाज के वंशाई
 हे विनांगनाओं के दुखदाई
क्या कहेगा तू, मैं बताती हुँ तू सुन
 विरक्त राग गाती हूँ,तू सुन
 में रोती हूँ तू सुन।

हे पहरेदारों की सरकार,
हमारे हको के हकमार,
में अपना सब ले जाति हूँ, तू सुन
तेरा ही विध्वंश राग गाती हूँ,तू सुन
मै चिल्लाती हूँ तू सुन,
में रोती हूँ तू सुन।

Saturday, 7 March 2015

घुसपैठिया औरत


                           

 

होती सीमाओं से अकसर घुसपैठ है,

पर अब घरों में घुसपैठ हो रही है,

सीमाएँ ,बन्धनों और कुप्रथाओं की दीवार खोखली करतीं है

कुछ घुसपैठिया औरत,

अजीब ही जंग लड़ती है यह घुसपैठिया औरत |

 

            माँ के रूप में कुछ अपनी बेटियों को हथियार चलाना सीखा रही है,

            कुछ प्यार से तो कुछ चिल्ला कर, अपने शब्दों से मन में घुसपैठ करती हैं

            कुछ घर के द्वार और शहर की ऊँची ऊँची दिवार फांद कर, गुसपैठ करती हैं,

           अजीब ही जंग लड़ती हैं यह घुसपैठिया औरत |

 

कभी प्यार से रोटियां बनाती हैं, कभी उसी तवे से डिफेंडर बन जाती हैं,

चाकू का धार तेज़ कर, काली में बदल जाती हैं,

बड़ी ही तेज़ हैं ,यह बेबाक लड़ाको के फौज़ में नहीं,

अकेले ही वार करती हैं,प्यार के बदले प्यार तो कभी

वार के बदले वार, मार कर चली जाती हैं,

यह घुसपैठिया औरतें,

अजीब ही जंग लड़ती है यह घुसपैठिया औरत |

 

                          आँख ,नाक ,कान खुले रखें यह मर्दानी समाज,

                          क्योंकि उनकी हर घटना पर नज़र हैं,

                          तख़्त पलट कर कभी भी राज़ कर सकती है

                           यह औरत, आपके ही आस पास रहती हैं,

                          यह ज़िंदादिल, सत्ता की प्यासी, नौ रूपों की मुरत

                          बड़ी ही अजीब, रक्त रणजीत, लाल रंग उड़ाती आती हैं,

                         बड़ी अजीब जंग लड़ती हैं,

                         यह घुसपैठिया औरत |

 

 

 

                                                    

Friday, 27 February 2015

''ofcourse I love you''


                                                                               ‘’ओफ्कोउर्स आई लव यू’’

यूँ कभी सोचती हूँ कि एक बिमारी जो आज मेरे हर दोस्त,मेरे आसपास लगभग हर किसी को हैं, वही मुझे और गरिमा को क्यों नहीं है|कभी सोचती हूँ कि कॉलेज में इतने लड़कियों के होने के बावजूद गरिमा में ऐसा क्या था जिसने उसके और मेरे बिच में अलग ही रिश्ता कायम कर रखा है|कई बार सोचने पर मुझे उससे और मेरे मन से सिर्फ एक ही जवाब मिलता है,कि हमारी दोस्ती इसलिए अच्छी हैं क्योंकि हम दोनों एक जैसे हैं,हमारी सोच एक डाल के दो चिड़ियाँ की तरह हैं जिसे कोई चिड़ा उड़ा न पाया हो|

चिड़ा से याद आया एक बार मैं भी फसने वाली थी| पर वह चिड़ा और मेरे बिच मेरे सेल्फ रेस्पेक्ट की दिवार थी,और आज की मांग जैसे घंटो एक दूसरे से बातें करना,चैट करना,कहीं जाने और आने से पहले उसकी डिटेल अदा करना और कभी न कर पाए तो झगड़ा और फिर क्या’’ओफ्कोउर्स आई लव यू’’यह सारी बातें न करके उसे मेरे दुर्गा रूप का व्याखान मिल गया और बिचारा एक दिन बाद ही मेरे डाल से नीचे उतर गया| आज कल समझ नहीं आता लोग फ्रेंड होते हुए भी पता नहीं फिर क्यों किसी दिन पूछ लेते हैं,क्या आप मुझ से फ्रेंडशिप करेंगी? ये फ्रेंडशिप शब्द अपने आप में ही बड़ा उत्तम दर्जे का शब्द है,जो उन्ही को समझ में आता है जो इसमें लिप्त होते हैं| भैया ,हम तो गंगा किनारे वाले हैं, जिन्हें सिर्फ यारी और दोस्ती समझ आवत है|

आज कल गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड होना अपने आप में एक सोशल स्टेटस हैं जहाँ अगर किसी का इस सोशल साईट पर पेज न हो तो लोग उसे या तो झूठा या फिर रेट्रो समझते हैं| आजकल मानो हर तरफ एक बर्निंग ट्रेन चल रही हैं ,पार्टी हो या फेसबुक स्टेटस हर कोई सिंगल से डबल होने की होड़ में हैं|इसके लिए हर तरफ,हर कोई महनत कर रहा है | कोई राहुल फेसबुक पर टाइम इन्वेस्ट करता हैं तो कोई सीमा वात्शाप पर अपनी मैथ्स इम्प्रूव करती है,तो कोई बंटी क्लास सिक्स से ही, इस मामले में सिक्सर मार कर अभी से ही सेफ खेलना चाहता हैं मानों यह प्यार नहीं, प्रधानमंत्री जन धन योजना हो ,जिसमे जो जितनी जल्दी अकाउंट खुलवायेगा वो उतना गौरान्वित फील करेगा| पर अपने लल्लन पाठक जैसे आशिक आज भी वह परानी आशिकी को जारी रखते हुए, रोड़ रोमियो बनकर ही अपने जूलिएट को ढूंड रहे हैं  तो  उनके दोस्त लड़कियों के घर के बाहर से ही नाम पुकारकर,गालियों की रशीद पा खुश हो जाते  हैं|

प्यार की यह सभी कहानियां मुझे अच्छी तो लगती हैं पर सच्ची नहीं| हम बीस के होते नहीं की बीस लोगों से सो कॉल्ड रिलेशनशिप बना लेते हैं,और उस पर आशिकी और रान्झाना जैसे फिल्मों के भरी भरकम डायलॉग दिए जाते हैं|पर इन सब पे मेरा तो एक यही डायलॉग है’’प्यार न हुआ की यूपी.ए. सी का एग्जाम हो, जिसमे मानो यह लोग हर साल एक नयी कमिटमेंट और लड़की के साथ ट्राई देते हैं और जब क्लियर कर पाते नहीं , फिर नए साल ,नए सब्जेक्ट यानी नई लड़की के साथ ट्राई देने चले आते हैं|’’और अगर कोई डटा भी रहा हो तो उनमे मुझे एक दूजे  के लिए प्यार कम और अंधविश्वास ज्यादा नज़र आता है|जैसे उसके पास मेरे लिए वक़्त नहीं रहा,वो कहीं किसी और के साथ तो नहीं,इत्यादि| कुछ लोग तो जहाँ अपने माँ बाप के कहने पर नहीं बदलते, वो दो दिन के प्यार के अकार्डिंग बदल जाते हैं,जैसे मेरी एक दोस्त अब जिन्स से सूट पर आ गयी है,तो दूसरी को अब गुस्सा कम और प्यार ज्यादा आता है|मानो इनको प्यार नहीं डायबिटीज हो गयी हो जिसमे इनकी सारी की सारी डाइट ही बदल गयी हो|

मैं यह नहीं कहती की प्यार गलत हैं,पर हमारा तरीका शायद गलत है,जिसमे प्यार कम और लोग परेशां ज्यादा करते हैं |प्यार कभी हमारी मज़बूरी नहीं होती,प्यार कमिटमेंट साथ रहने का नहीं साथ महसूस करने का होता है| प्यार हमारे सिर्फ अच्छाइयों के साथ जीने से ज्यादा,एक दूसरे की बुराईयों का साथ हैं|बार बार खबर लेने और देने से ज्यादा ख़बर रखने का साथ हैं और हमारा ‘’प्यार’’,हमारी गर्लफ्रेंड और हमारा बॉयफ्रेंड होने से ज्यादा एक साथी होना चाहिए, जिसके साथ रिश्ते टूट भी जाये तो लौट आने की उम्मीद  हमेशा कायम रहे और जिसे हमें हर वक़्त कहना न पड़े’’ओफ्कोउर्स आई लव यू’’|  

Saturday, 21 February 2015

मेरी व्यथा (एक शिकायती ख़त )


                  मेरी व्यथा(एक शिकायती ख़त)

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

                       नमस्कार| कल मैंने और मेरे समाज ने आपका भाषण सुना, आप हमें घरों से लेकर शहरों तक से निकालने की बात कह रहे थे|पर उस वक़्त हमारी हिम्मत और भी टूट गयी जब आपके इस खिलाफ़त आन्दोलन का,इस शाजिश का सभी ने तालियों से स्वागत किया |

पर आज मैं आपसे एक प्रश्न पुछना चाहता हूँ कि जब मैं आपके शरीर,समाज और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा हूँ तो आप मुझे कैसे जड़ से ख़त्म कर पायेंगे? पहले तो लोगों से मुझे घर से बेदखल कर दिया,फिर किसी कूड़ेवाले ने मुझे वीरान जगह छोड़ दिया, नगर निगम ने शहर से निकल दिया,पर आप ही बताये, हम जाये, तो कहाँ जाये? इतना ही नहीं आपके नमामि गंगा ,सफामी यमुना जैसे मुहिमों ने हमें घृणा की वस्तु बना दी है| मेरे अकेलेपन का यह आलम है की अब तो मेरे प्रिय मित्र झाड़ू ने मेरे वाटसेप नंबर को ब्लॉक और फेसबुक से अनफ्रेंड कर दिया है और इसकी वजह आप नेता है, जो उसे वी.आई.पी बनाकर सफाई की जगह जयकारे लगाते हैं|

आप कहते हैं कि आप प्रधानमन्त्री नहीं प्रधानसेवक हैं, तो हमारी भी एक सेवा करिए|जिस प्रकार जातिगत राजनीति आप के समाज का एक प्रमुख वोट बैंक है,उसी प्रकार आप हमें भी वर्गीकृत कर दीजिये| प्रायः प्लास्टिक जाति की यह शिकायत रहती है कि उन्हें मल-मूत्र के साथ रखा जाता है,और कांच परिवार की शिकायत रहती है कि उन्हें नाले ,छिलके ,जूठन आदि के साथ रख दिया जाता है| इसलिए हमारे और हमें उठाने वाले उन बाल कबाड़ियों के लिए,हमें बायोडिग्रेडेबल,नॉन बायोडिग्रेडेबल या फिर ड्राई और नॉन ड्राई जाती बना कर अलग अलग कूड़ादान प्रदान करें|ताकि सबके लिए अलग अलग स्कूल ,कॉलेज,दंड और मृत्यु हो|

आखिर में, मैं कूड़ा आपसे से विनती करता हूँ कि हमें भी मेक इन इंडिया में जगह दे,क्योंकि हम तो पहले से ही ‘मेक इन इंडिया’, ’मेड बाई इंडिया’ , ‘यूज़ड बाई इंडिया’ और ‘थ्रोन बाई इंडिया’ है |हमारा महत्व समझिये क्योंकि हर कूड़े का ढेर अपने आप में बदलती सभ्यता का इतिहास है| कैडबरी ने किटकेट को कब हराया,लत्ते दायेपर्स कब बन गए और कब गर्ल्स डीयो ने बॉयज डीयो के साथ बटवारा कर लिया,इन सबका ओपिनियन पोल मैं ही तो हूँ|

अतः मेरी देश भक्ति पर प्रश्न चिन्ह न लगाते हुए, मेरी व्यथा समझने की कृपा करे| आशा करता हूँ कि हमें संयुक्त राष्ट्र तक नहीं जाना पड़ेगा और कूड़ा समाज के लिए आप जल्द ही अच्छे दिन लायेंगे|

सधन्यवाद,
आपके प्रिय अभियान का मुख्य कारण
   ‘कूड़ा’            

 

Saturday, 3 January 2015

कुछ छुटने से पहले



सफ़र पे निकलने  से पहले हमें हमेशा अपनी पैकिंग एन वक़्त से पहले ही कर लेने चाहिए ताकि कोई भी  चीज छुट न जाये| कभी काबर तो ऐसा भी होता है की सब पैक हो चुका होता है और कुछ चीजे हमारी लापरवाही के कारण छुट जाती  है| तो कभी उन चीजों के बिना काम चल जाता है, तो कभी किसी चीज के छुट जाने से जिंदगी की गाड़ी, दौड़ने की ज़गह चलने लगती है|

उस दिन ट्रेन छुटने ही वाली थी,सारा सामान हम  ट्रेन में रखवा चुके थे पर फिर भी कुछ छुट रहा था |   आज भी मुझे  याद है की कैसे ट्रेन खुलने के आखरी सेकंड्स तक वो स्टेशन की भीड़ में कभी उसे ढूंढती तो कभी अपने मोबाइल को देखती| आख़िरकार ट्रेन खुल पड़ी, मोबाइल साइलेंट पड़ा रहा और वो  एक हलकी सी मुस्कराहट के साथ दरवाजें से अपने सिट पर जाके बैठ गयी| उससे एक आदमी ने पूछा था,   कि बिटिया कुछ छुट तो नहीं गया? उस दिन उसने ‘’ न ‘’ कहा था पर आज लगता है , हाँ शायद कुछ छुट ही गया था | 

 वो उसका सबसे अच्छा दोस्त था, शायद इसलिए उसे काव्या से ऐसी उम्मीद न होगी| काव्या और आशु सालों पुराने दोस्त थे , उनकी दोस्ती ऐसी की अगर एक कुछ भी काण्ड करे तो नाम दोनों का आये| चोक्लेट और कॉफ़ी दोनों में  से कोई भी खाए या पिए ,पर  आशु ही चोक्लेट का बिल पे करे तो काव्या कॉफ़ी की| हॉस्टल की छुट्टियों में हम सब अपने घर जाते पर  काव्या पहले आशु के घर दो दिन रहती फिर अपने घर झाँसी जाती| मुझे आज भी याद है ,मास्टर्स के आखरी दिनों में वो कैसे एक दूसरे से कटे कटे रहने लगे थे मानों दोनों एक दूसरे को किसी गलती की सज़ा दे रहे थे| आखरी बार भी जब मैंने कॉफ़ी हाउस में उन दोनों को मिलने के लिए बुलाया था, उस दिन भी वो दोनों चुप से थे | आशु ने  कुछ देर बाद भी अपनी चुप्पी तोड़ी भी तो काव्या से बस  यही पूछकर,की उसकी सारी पैकिंग हो गयी, सब ले लिया न! कुछ छुट तो नहीं रहा? उस दिन पता नहीं क्यों वह अचानक बिना बोले ही उठकर चली गई थी और कुछ देर बाद आशु भी पहली बार कॉफ़ी का बिल पे कर चला गया |

आखरी दिन काव्या और मैं सर्टिफिकेट्स लेकर कॉलेज से लौट रहे थे,की गेट पर ही हमें आशु मिल गया|   वो खुश था और हमारे रास्ते के लिए खाना और कुछ चोक्लेटेस लाया था | उसे देखकर काव्या भी खुश हो गई और पता नहीं, अचानक उसे क्या सूझी की उसने उसी वक़्त चोक्लेट की रैपर निकाली और  उस पर  कुछ लिखने लगी | आशु ने पूछा : काव्या सब ले लिया ना! अपने फैले सामान को  बटोर कर रख लिया न ,वैसे भी तुम्हारी पुरानी आदत है, एन वक़्त पर चीजो को पैक करना और फिर छुटी हुई चीजों के लिए मुझे दौड़ना| काव्या ने कहा : हाँ, पर इस बार भी कुछ छुट रहा है,पर अब ये तुम पे है की इस बार  तुम मेरे लिए भागों गे या नहीं | इतना कहकर वो चोक्लेट के गोल्डन रैपर उसे पकड़ा के भाग गयी|

काव्या की जिंदगी उस दिन के बाद आज भी वैसी ही हैं, वो खुश है और मेरे पूछने पर की उस दिन उसने ऐसा क्या लिख कर आशु को दिया था कि ,की दो साल हो गए, उसका एक मैसेज तक नहीं आया? तो उसका यही जवाब होता है -   मैंने अपनी मन की बात कही थी उसे, मैं उसे अपनी मन की बात बिना बताये वहां से लौट नहीं सकती थी,हमारा रिश्ता हमेशा से ही निस्वार्थ था और मैंने उसे अपने साथ कभी  बाँधा नहीं था, मैंने उस दिन भी उसे कहा था की अब ये उसकी मर्जी हैं,की वो मेरे छुटे सामान के पीछे भागेगा या नहीं ?

   काव्या कहती है की उसे आज भी लगता है कि कभी न कभी आशु रिप्लाई जरुर करेगा,तो कभी वह दुखी होकर बच्चों की तरह  मुझसे पूछती है कि आशु कही उस दिन के बाद से ,उससे नाराज तो नहीं हो गया, कही वो उससे नफ़रत तो नहीं करने लगा? ये सवाल पूछते पूछते कभी कभी उसकी आँखे छलक पड़ती है| सच कहूँ तो मुझे उसकी आँखों में प्यार खोने से ज्यादा, एक दोस्त के खोने का ज्यादा दुःख नज़र आता हैं|

फिर भी आज भी जब कभी हम अकेले बैठते है, और आशु की बात आती है तो वह कहती हैं: यार मैंने तो एप्लीकेशन और सिवी तो डाल दी थी न ! अब उसने डिलीट कर दी हो या  पेंडिंग रखी  हो, पर मुझे खुशी है मैंने कोशिश तो की |मैंने पूरी कोशिश तो की न! अपनी पैकिंग पूरी करने की ,ताकि कुछ छुट न जाये,अधुरा न रह जाये,जाने से पहले,सफ़र से पहले और ...............   कुछ छुटने से पहले|