पहरुए सावधान रहना
उन दिनों नीले आसमान का वह नीला सूरज अजीब ही भयंकर प्रतीत हुआ करता था . वक़्त के उस पहर में आसमान से जमी तक बस एक ही रंग पसरा हुआ था नीला. बाग ,बगीचे से लेकर बागवान तक सब नीले थे और नील थी इन बगीचों की पैदावार.
ये दौर था चंपारण का , बिहारियों के नील सागर में डूबने का दौर . इस दौर में नील ने उनसे उनका सब छीन लिया था, घरबार , सुख चैन यहाँ तक की उनकी माँ, उनकी जमीन भी . माँ को बचाने की जंग में ही कितने बलि चढ़ गए पर माँ वापस न आई क्यों कि नील के ठेकेदारों के लिए वह गिरवी थीं और इस माँ के बेटे कर्जदार .
स्वतंत्रा की लिपि में लिखते हुए बाइस्कोप की दृश्यों की तरह वो दृश्य सामने चल पड़े हैं . वो दुःख,वो पीड़ा ,वो आक्रोश,वो बलिदान सब याद आ गया . आज राम प्रसाद बिस्मिल की वही विपल्व गायन याद आ गया,कि
“ कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ की उथल पुथल मच जाये , एक हिलोर इधर से आये एक हिलोर उधार से आये”.
स्वतंत्रा की इस कहानी मे वेदना थी, विडम्बना थी ,वैभव था ,विरोध था तो विराग और वियोग के गीत भी थे . अमर होने वालों के नाम हमारे मुख्य पृष्टों पर सदैव रहेगा पर अमरता की इस आड़ में को बलि चढ़ गए उनका क्या ? क्या हुआ उन बंधुआ मजदूरों का ,गिरमिटिया का , श्रमिकों का जिनका आक्रोश ही इस संग्राम की जनिनी थी .
मैं बात कर रही हूँ उस गिरमिटिया प्रथा की जिसने १९१३ से १९१४ में लोगों से उनके अपने छीन लिए . अपने देश छुडवा दिए वो भी सिर्फ थोड़ी सी मजदूरी के लिए . पूछिए कि उनकी क्या गलती थी जो अंग्रेजों ने उन्हें गिरमिट बना कर पञ्च बरस या इससे कम की मजदूरी के इकरारनामे पर दस्तखत करवा उन्हें विदेश में मजदूरी करवाया . सिर्फ तिन पोंड मिलने वाली मजदूरी ने इन मजदूरों श्रमिकों की जान ले रखी थी . उनका घर बार ,जमीं जायदाद , सुख चैन सब को अपने अधीन कर उन्हें पराधीन बना दिया था . क्या इन्ही मजदूरों ने अंग्रेजों का व्यवसाय के बदले पराधीनता स्वीकार करने की हामी भरी थी . करारनामा तो राजाओं ने किया था . अपने फायदे के लिए सन १६०० में कुछ गज जमीं दी थी और धीरे धीरे दमक की तरह कितने गज जमीन खा गए .
हम कैसे भूल सकते हैं नील का वह धब्बा जिसने रजा जनक की भूमि चंपारण को बाँझ बना गयी . जो जमीं कभी सीता की जनिनी हुआ करती थी अब वो नील के अलावा कुछ और पैदा करने लायक न रह सकी . चंपारण में जैसे आम के वन हैं, वहां सन १९१७ में नील के खेत थे . चंपारण में किसान अपनी ही जमीं के 3/ २० हिस्से में नील की खेती ,उसके असल मालिक के लिए क़ानूनी रूप से करने को मजबूर थे . तो तिनकठिया कौन था ? वो जमींदार या वो राजा जिनका कोष भी इनके राजस्व से भरता था . इतिहास गवाह ही इस बात की आन्दोलन अशंतोश , आक्रोश से पैदा होती है और राजों ने कभी आन्दोलन नहीं किया है .
असंतोष तो उन दिनों कलकत्ता ,गुजरात , यूपी और बिहार के मजदूरों में भी था . जहाँ गांव के बच्चे मारे मारे फिरते थे या माँ बाप दो तीन पैसे की कमाई के लिए उनसे पूरे दिन नील के खेतों में मजदूरी करवाया करते थे . उस समय पुरुषों की मजदूरी वहां दस पैसे ,महिलों की छह तो लड़कों की तीन पैसे से अधिक नहीं थी . तो दुःख गाथाये किसकी थी इन लोगों की या इनके पैसे पे जीने वाले राजाओं और जमींदारों की . वो तो भारत भूषण पंडित मालवीय जी जैसे आम लोग थे ,जिन्होंने नेटाली गिरमिटियों पर से तिन पोंड का कर सन १९१४ में रद्द करवाने के बाद. भारत में इसके लिए आवाज उठाई और अतः एक बड़ी लड़ाई लड़ने के बाद ३१ जुलाई १९१७ में यह ख़तम कर दिया गया .
ऐसे ही नील का धब्बा धोने वाले राजकुमार शुक्ल कोई जमींदार नहीं थे बल्कि एक किसान थे . जिन्होंने गांघी जी को बिहार ले जाकर वहां की दशा दिखाई . बिहार समेत देश से कई स्वमसेवक इकट्टा हुए जिनमे राजेंद्र प्रसाद,अवान्तिकाबाई गोखले ,आनंदी बाई ने क्रांति की शुरुआत की . इस क्रांति से किसानो से लेकर पट्टीदार तक में स्वतंत्रता की भावना जागृत हो गई. और इस तरह एक बड़ी लड़ाई का परिणाम ये था की सन १८६० में नील की खेती बंद कर दी गयी .
खेडा सत्याग्रह भी ऐसे ही एक क्रन्तिकारी घटना थी . खेडा के दो मजदूर मोहनलाल पंड्या और शंकरलाल पंड्या का पत्र गाँधीजी को मिलते ही वह ठेदा की ओर चल पड़े . खेडा में फसल बर्बाद हो गयी ही थी और सरकार लगन माफ नहीं कर रही थी . इसका परिणाम यह हुआ की गाँधी जी ने खेडा में सरदार वलभ भाई पटेल ,अनसुइया बाई ,शंकर लाल बैंकर के साथ मिल कर सत्याग्रह शुरू किया. उन दिनों अहमदाबाद ,कठियावाड, बारडोली में मील में कम करने वाले मजदूर, मिल मालिकों की मनमानी से परेशां आ गए थे. उस वक़्त गाँधीजी ने खादी का आह्वाहन किया. चरखा चले और इसी तरह नमक कानून तोड़ ,घर में ही नमक तैयार करके लोगों ने अंग्रेजों की असहयोग शुरू हो गई. असहयोग बढ़ता गया . और आखिरकार सबकी महनत रंग लायी असहयोग सफल हुआ और तब भरता छोड़ों आन्दोलन ने अंग्रेजों को भारत से उखाड़ फेंका . १५ अगस्त १९४७ में भारत आज़ाद हुआ.
यह आज़ादी असल में हमारी कभी नहीं थी .भले भी गाँधी जी इस मशाल की आग थे पर ये आग छोटी छोटी जिन लपटों से बनी थी वह,खेतिहर किसान थे,मजदूर थे,और गिरमिट थे. किसानों ने जहाँ इसकी बीज बोई,मजदूरों ने महनत की और बुनकरों ने यह भारत हमें बुन कर दिया और जिन लेखकों ने इस आज़ादी को बोल दिए उन्हें मेरा सलाम . तभी कवि गिर्जाप्रताप ने हमसे कह्गये
“आज जीत की रात पहरुय सावधान रहना,
दीपक सामान रहना ,खुले देश के द्वार ,
पहरुय सावधान रहना |”