Sunday, 26 July 2015

मिले सुर मेरा तुम्हारा


             मिले सुर मेरा तुम्हारा

कल चिड़ियों का एक दस्ता बड़े लय और ताल में उड़ा जा रहा था . मैंने पूछा ये किस लयताल में.कहाँ की ओर चले ? तो कहने लगे

“मिले सुर मेरा तुम्हारा की लयताल पर , बिहार चले .”

चिड़ियों का यह कहना गलत नहीं है .बिहार इस समय चुनाव रूपी उत्सव की ही तैयारी में हैं . बिहार का हर चौक चौराहा ,हर चाय पर चर्चा , चुनावी दाव पेंच से सराबोर है .वही सभी दलों ने भी अपनी अपनी कमर कस ली है.

जनता दल , राजद ,राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी का यह महाविलय ,नितीश कुमार के सुशासन के दावों पर चुनाव लड़ेगी. वही बीजेपी 160 हाईटेक रथ चलाएगी जी जीपीएस प्रणाली से लैस हो बिहार में बीजेपी के परिवर्तन का प्रचार करेगी.

हाल ही में संपन्न हुए विधान परिषद् चुनावों में बीजेपी को मिली सफलता से जहाँ उनमें जोश और उम्मीद है ,वहीँ अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाय रखना नितीश और लालू के लिए चुनौती .

गौरतलब है कि बिहार की राजनीती में जातिगत समीकरणों का अभी भी बहुत महत्व हैं . लालू इसके घाघ खिलाडी हैं तो अमित शाह भी इस खेल के परम पंडित है . अब देखना यह होगा की बिहार किसे चुनता है . विकास को या जातिगत विरासत को. और इस छठ में किसकी गीत सुनाई पड़ती है, कौन सा राग बजता है? भाजपा का या महागठबंधन का सुर “ मिले सुर मेरा तुम्हारा’’.

  

 

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