Monday, 8 August 2016

shamshaan

रात ढलती जा रही है ,
मानों कोई राह हो, शहर से  शमशान तक
शाम ढलती जा रही है ,
शहर से शमशान तक |
  वह चादर हर शाम मुझे उढाता है ,
  मानों , जाना है मुझे  शर्द में विरान तक ,
  दिल ठहरता जा रहा है ,कट रहा है रास्ता, शहर से शमशान तक|
अब शिकायतें मायने नहीं रखती ,
बेअसर है दुआ रहनुमां तक ,
यह लोग बदलते जा रहें हैं ,
सब सफ़र में हैं ,
शहर से शमशान तक |
   विरान ,शमशान बड़े शान से बढ़ रहा है |
   मतलबी इंसान तक ,
   भयभीत तन सिकुड़ रहा है ,
 मानों यात्रा में है यह शहर , शहर से शमशान तक |