Monday, 1 September 2014

तुम्हारा नाराज़ होना भी ''सिमत-ए-अदा'' है


                  "तुम्हारा नाराज होना भी एक सिमत- ए - अदा है"

सॉरी मैं लेट हो गयी. वो तुम्हारे लिए वाइट रोज और चोकलेट ले रही थी. फिर ये रोज़ रोज़ की ट्रैफिक, जो हमेशा तुम तक आने में लेट करवा ही देती है. अच्छा सॉरी बाबा, मान भी जाओ. अब यार तुम्हें मनाने लिए मैं तुम्हारे इस रूप में तुम्हारे इन ग्रेवयार्ड फ्रेंड्स के साथ और टाइम स्पेंड नहीं कर सकती. सॉरी यार! मान भी जाओ मेरी जान. मानो नहीं तो मैं चली.

आज भी तुम्हारा नाराज होना तुम्हारी एक सिमत –ए –अदा है. कभी सोचती हूँ कि तुम नादान थे या मैं. कभी पूछती हूँ खुद से कि मैंने कभी अपने दोस्ती की सीमा पार की क्यों नहीं? तो शायद तुम और हम जिंदगी के किसी राह में तो साथ होते. पर कोई नहीं. अब जिंदगी तुम्हारे बिना भी अकले अच्छी लगती है. तुम्हारी यादे भी तपते हुए धूप में बेहद सुकून देती है. बस कभी कभार ऐसा लगता है कि काश इस बरसात में तुम साथ होते. हम साथ में भीगते और............ काश !

कभी जब किसी दिन यू हीं किसी कहानी में तुम्हारा नाम आ जाता है तो दिल दो बार धड़कर ठहर जाता हैं और दिमाग कहता है, अच्छा हुआ तुम चले गए. नहीं तो जिंदगी भर तुम्हारी अहमियत ना समझ पाती.आज कम से कम इस बात का पता तो चला कि हमेशा बोलने वाली मेरी जुबान भी कभी चुप रह कर शिकायत करती है.

जब कभी शाम को हवाओ में ठण्ड ज्यादा होती है तो मैं अपनी खिड़कियों को खोल कर उन हवाओं में तुम्हारी मौजूदगी महसूस करती हूँ . कभी जब भीड़ में किसी खुसफुसाहट के बीच अचानक से हंसी-ठहाकों की आवाज़ आती है तो मैं समझ जाती हूँ कि तुम जहाँ हो खुश हो. तुमने वहाँ भी अपने कई दोस्त बना लिए हैं. है न ! चर्च तक जाने वाली राह बहुत शांत होती है. इसी राह में कहीं से आने वाली सीटियों की आवाज मेरे रूह में तुम्हारी रूहानियत भर देती है .तुमसे कहने को तो बहुत कुछ हैं पर अब मेरी खामोशियों को ही बोलने दो. क्यों? क्योंकि तुम ही तो कहते थे," कभी चुप भी रहा करो और तुम्हारी खामोशियाँ को भी कहने दो." देखो अब तो बस वही बोलती हैं.

चर्च में हर शाम तुम्हारे लिए जलाये मेरे हर कैंडल तुम्हारी और मेरी अमर कहानी कहती हैं. जिसमें ना कभी कोई इकरार था,न कोई एतवार और न कोई इंतजार. शायद जो था वो था बस सिर्फ प्यार.अच्छा था कि हमारे रिश्ते को कोई नाम नहीं मिला,किसी बंधन में नहीं बंधा क्योंकि  अगर ऐसा होता तो शायद यूँ कभी हम दोनों का रिश्ता लक्ष्यहीन उड़ान ना भर पाता. और मैं कभी तुम से ये बार बार न कह पाती कि "सुनो, तुम्हारा नाराज होना भी एक सिमत –ए -अदा हैं.’’      

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