Friday, 29 August 2014

इंसानी फ़ितरत


इंसानी फ़ितरत है यह

हम अपने आप से ही जयादा कतराते हैं,

दुनिया को जानने का दावा करते है,

पर खुद को ही नहीं, जान पते हैं|

         डरतें है हम अपने मन से

         हर वक़्त एक झूठी शोर में जीतें है,

         कहीं यह दिल सच न कह दे,

         हर पल इस डर से होठों को सीते हैं,

          इंसानी फ़ितरत है यह

         अपने आप से भागते फिरते हैं|

हम उन गलियों में लौटना चाहते ही नहीं,

जिसमे हमारे निशां हैं,

क्युकि हम जानते है कि कहीं वो गलियां हमारे गुमनाम होने पर सवाल न करदे,

 इंसानी फ़ितरत हैं यह वह भागते है,

दर्द से,शांति से,गलतियों से क्युकि

अपने सचाई को वह हर पल मारते  हैं,

बेहिसाब भागते हैं|

                         

No comments:

Post a Comment