Tuesday, 26 August 2014

उन्हें भी तकलीफ है,मेरी अनदेखी से


किसी शाम जब मैं और मेरी किताबे डेट पर जाती है,तो अक्सर उनकी शिकायत होती है कि तुम अपना वक़्त सबको देती हो पर मुझे नहीं|आज शाम भी कुछ ऐसा ही वाकिया हुआ.आज बहुत दिनों बाद मैं  अपने  स्टडी रूम की सफाई करने पहुंची.मैंने जैसे ही कमरे में पैर रखा,सबसे पहले मेरे लैंप ने अपना बल्ब फ्यूज कर मेरा स्वागत किया|इतना ही क्या कम था कि जब मैंने अपने कोर्स की किताबो को उठाया तो किताब गिर कर फट गयी मानो कह रही थी मैडम जी, कभी हम पर भी दया दृष्टी करिए|

उस दिन वो अलमारी धूल से सनी हुई थी. निराला बेखबर से एक कोने में पड़े थे, तो एक कोने में बच्चन. नीचे के अगली ही शेल्फ में प्रेमचंद्र और कीट्स जहां अपनी ही दुनिया में मग्न थे वहीँ दुष्यंत कुमार और ग़ालिब मेरी नई लाई किताब 'रात पश्मीने की' गुलजार के साथ मिलकर कुछ नए गीत और अंतरा बना रहे थे. इन सबसे दूर धर्मवीर भारती और दिनकर खामोशी से अपनी जगह टिके हुए थे. इस शेल्फ को मैंने जैसे ही हाथ लगाया कि गुनाहों के देवता गिर पड़े और चेतन भगत गिरते ही बिखर गए. शायद किसी किताब से ही वो कागज का टुकड़ा गिरा हो जिस पर लिखा था 
सुनो, 
तुम्हारे संबंध अब गूगल हो चले हैं, इसलिए हमारा रिश्ता फेसबुक हो गया है. जहां तुम चैट पर रहकर भी चैट ऑफ़ कर गूगलिंग करने निकल लेती हो .....             

ग़ालिब के शब्दों में कहूँ तो 'ग़ालिब तुम बड़े बेदर्द निकले,दिल लगाया और बेवफा कर दिया'. सच कहूँ तो मैं खुद ही आज गुनाहों के देवता बन गयी हूँ |

आज घंटो मान मनुहार चला तब जाके कहीं वह माने. फिर वह कहने लगे, सुनो तुम गूगल के ज्यादा करीब हो और अब हमारा रिश्ता फेसबुक हो चला है. जिसमें तुम चेट पर रहकर भी चेट ऑफ कर मुझे छोड़ छिप छिप के गूगल से बात करती हो. मुझे बुरी लगती हैं तुम्हारी यह अनदेखी|फिर दो कप चाय पिकर मेरे और उनके बिच की यह गुफ्तगू आखिरकार मेरे माफी मांग कर,हर शाम उनके साथ लॉन्ग ड्राइव के समझौते और वादे पर ख़त्म हुयी|     

 

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