Tuesday, 19 August 2014

वो पंखविहीन चिड़ियाँ


उस दिन शाम जब मैं और पूजा बगीचे में खेल रहे थे,तब एक नन्ही सी चिड़ियाँ गुलाब के फूलों के पास आ छुपी थी.खेलते खेलते मेरी नज़र उस चिड़ियाँ पर पड़ी .हम उसके जितने करीब जा रहे थे वो उतनी ही दूर हम से दूर फूलों से चिपटी जा रही थी मानो हम दोनों ही एक दूसरे के साथ नुक्का छिपी खेल रहे हो .अचानक कहीं से एक और उस जैसी एक बड़ी चिड़ियाँ आयी और वह छोटी चिड़ियाँ को साथ ले गयी,शायद वह उसकी माँ थी.अगले ही शाम जब हम फिर बगीचे में खेलने आये तो वह छोटी चिड़ियाँ वही हमारा इंतजार कर रही थी ,हम दोनों जैसे जैसे जहाँ जहाँ छिपते और दौड़ते वह भी हमारे साथ उड़ती.धीरे धीरे दिन बीते और हमारी दोस्ती और भी पक्की होती गयी.अब मेरा और पूजा का हर शाम उसके साथ बीतने लगा.हम उसके लिए दाने भी लाया करते थे और वह हमारे लाती थी,ढेर सारा स्नेह और मुस्कुराहट.

एक दिन जब हम शाम को बगीचे में पहुंचे,तो काफी इंतजार के बाद भी हमें वह न मिली .पता नहीं वह उस दिन कहाँ चली गयी थी,?यु ही इस तरह हम दोनों उसका घंटो इंतजार करते रहे पर वह नहीं लौटी .हम अक्सर एक दूसरे से सवाल करते की वह चिड़ियाँ अब यहाँ क्यों नहीं आती ,नजाने वह कहाँ चली गयी है?

एक हफ्ते बाद जब एक दिन हम बगीचे में खेल रहे ते तब हमारी नजर उसी गुलाब के फूलों की ओर गयी .हमने देखा की वह चिड़ियाँ वहां घायल हालत में पड़ी थी,ऐसा लग रहा था की मानो उसे किसी  पतंग के मांझे से चोट लगी हो,उसके पंखों में से खून बह रहा था,हम उसे तुरंत ही घर ले आये .उसके मरहम पट्टी भी की और यूँ ही काफी दिनों तक हम उसकी सेवा में लगे रहे.हर दिन स्कूल से आने के  बाद हम दोनों उसे देखने चले जाते थे और पूरी शाम उसके साथ ही बिता कर घर लौटा करते थे,हमने उसके रहने का इंतजाम बगीचे के एक पेड़ पर किया था.हमारी दवाई से उसका जख्म तो टिक होने लगा था पर पर हमारी दावा उसके मन के जख्मो को ठीक न कर पाई थी.वह चिड़ियाँ अब उड़ नहीं पाती थी.अब धीरे धीरे उसने दाना खाना भी बंद कर दिया था,और अब बोलना भी न के बराबर हो गया था .शायद जिस पतंग ने उसके पंख छीने थे उसने उसका होंसला भी छीन लिया था और एक दिन उसके मरे हुए मन के साथ ही उसका भी निधन हो गया.

हमें दुःख है की हम उसे बचा न पाए,हम उसे उसकी सीमाहीन उड़ान  न लौटा पाए,मुझे पहली बार अहसास हुआ की एक चिड़ियाँ के लिए उसके पंख उसकी जान  होते है,उसका सीमाविहीन उड़ान ही उसकी पहचान होते है .आज सबसे बड़ा दुःख तो मुझे इस बात का है की वह उड़ान अब ख़तम हो गयी है,किसी  के शौखिये खेल ने किसी का शौख छीन लिया था  और किसे से उसकी अनमोल दोस्त.

आज पता चला की आजादी,उमंग और शौख किसी के पंख होते है और अगर उन पंखो को जरा सी चोट लग जाये तो आत्मा दुखी हो जाती है. गर जो पंख किसी के वजह से कट जाये तो मौत अपने आप हो जाती है.हमारी प्यारी दोस्त अब नहीं है,अब जब भी कभी हम आसमान को देखते है तो याद  आती है वह गरबीली चिड़ियाँ, वह पंखविहीन चिड़ियाँ .     

No comments:

Post a Comment