Sunday, 17 August 2014

कितनी मुदत बाद मिले हो


 

 

कितनी मुदत बाद मिले हो ,

ओं पतझर के परदेशी,

सावन बिता ,पतझर बिता,बीत गए वह सारे दिन .

सावन बिता ,पतझर बिता,बीतगए वो सारे  दिन ,

राहे बदली,यादे बदली,बदली जिंदगी की तस्वीरे,

न बदली तो वह चाहते,

और दरवाजे पर  वही पुरानी आहटे .

कई बार यह गुमां होता है ,

की मेरे ख्वाबो को शायद  जंग लगी है ,

पर अगले ही पल  महसूस होता है,

 अब हौसलों को पंख लगी है.

         कितनी दरखतो में जिंदगी बीते,

हाले  दिल बायाकरना मुश्किल है.

पर उन्ही दरखतो में वह आग छुपी है ,

जिसकी जरुरत आज हमें  पड़ी है ,

कितनी मुदत बाद मिले हो,

ओं रूठे मौसम के साथी ,

 कहाँ छुपे थे तुम अब तक, ओं पतझर के परदेशी.सावन बिता ,पतझर बिता ,बीत गए वो सारे दिन,कितनी मुदत बाद मिले हो.             

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