कितनी मुदत बाद मिले हो ,
ओं पतझर के परदेशी,
सावन बिता ,पतझर बिता,बीत
गए वह सारे दिन .
सावन बिता ,पतझर बिता,बीतगए
वो सारे दिन ,
राहे बदली,यादे बदली,बदली
जिंदगी की तस्वीरे,
न बदली तो वह चाहते,
और दरवाजे पर वही पुरानी आहटे .
कई बार यह गुमां होता है ,
की मेरे ख्वाबो को
शायद जंग लगी है ,
पर अगले ही पल महसूस होता है,
अब हौसलों को पंख लगी है.
कितनी दरखतो में जिंदगी बीते,
हाले दिल बायाकरना मुश्किल है.
पर उन्ही दरखतो में वह आग
छुपी है ,
जिसकी जरुरत आज हमें पड़ी है ,
कितनी मुदत बाद मिले हो,
ओं रूठे मौसम के साथी ,
कहाँ छुपे थे तुम अब तक, ओं पतझर के परदेशी.सावन
बिता ,पतझर बिता ,बीत गए वो सारे दिन,कितनी मुदत बाद मिले हो.
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