वो रंग दो चार,वो बातें
हजार,वो मुस्कुराहट बे हिसाब,
वो घंटों बारिश में भीगना
,फिर यूँ ही छाते को हवाओं के हवाले करना
वो गोल गप्पे की दुकान,वो
ट्रैफिक पुलिस,मोटा पहलवान
वो राह चलते इमलियों पर
निशाने,कभी अमरूद के ठिकाने,
खुलती थी हमारी खुशियों की दुकान,
ऐसे थे मेरे दोस्त महान|
पहले खुद ही गलतियाँ
करना,फिर बे वजह किसी बात पर अड़ना,
खुद मुंगफली के छिलके
उड़ना,फिर नाम किसी और का लगाना,
दुसरो के सीक्रेट का
भांडाफोड़ कर जाना,
और बार बार यह दुहराना,
हम है खुदा के शरीफ
बन्दे,पर कभी बन जाते हैं गुंडे,
ऐसे थे हमारे स्लोगन,दोस्ती
गान
ऐसे थे मेरे दोस्त महान |
अब हो गयी है मेरी दुनिया
वीरान,
कहाँ हो मेरे दोस्त महान?
दो अपने दोस्ती की पहचान,
लौट आओ मेरे दोस्त महान|
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