Wednesday, 20 August 2014

टूटता तारा


जब कभी जमीं पर सितारों की जगमगाहट,चाँद के उजालों में छिप कर मेरे छत पर नहीं आती,उस रात मेरे लिए पूरा का पूरा आसमान की देखने योग्य नहीं रहता.मुझे याद  है कि गर्मियों की इन रातों में    अक्सर जब आसमान साफ़ रहता था तो वो सारे तारे मुझ से  एक एक कर गप्पे लगाया करते थे.आसमान के हर कोने के वह सितारे मेरी छत के हर कोने से दिखाई पड़ते थे पर अब सितारों ने मेरे छत से शायद अपना मुंख मोड़ लिया हैं या अब शायद वह पृथ्वी के इस गोलार्ध से ही जा चुके है या उन्हें हमारे वातावरण के प्रदुषण युक्त परतों ने ढक लिया हैं .

पता नहीं क्या हुआ है,बदलाव किस्मे आया है ?क्या मेरी आँखों ने आसमा को फुर्सत से झाकना बंद कर दिया है या उन तारों ने मेरे घर का रास्ता भुला दिया है.मैं कुछ नहीं जानती ,जानती तो बस इतना हूँ कि भले आसमा में चाँद का आकर जितना भी बड़ा हो ,उसकी चांदनी कितनी भी सीतल क्यों न हो, वो आसमान के उन सितारों की रौशनी की जगह नहीं ले सकता.

उन एक एक तारों को देख कर ही मैं  हर रात अपनी नयी काल्पनिक दुनिया में खो जाती थी,जो बहुत सुकून भरी होती थी. पर अब मेरी दुनिया में कल्पना से परे ही एक कहानी है,जिसके पन्नों में हर चौबीस घंटे की लिखापढ़ी हैं,वास्तविकता से उसका इतना सम्बन्ध है कि कभी कबार दिल करता है की यह दुनिया भी पलक झपकते ही ख्वाबो की तरह बदल जाती .काश! की कभी ऐसा हो जाये कि एक शाम एक टूटता तारा अपने साथ मुझे भी इस निष्ठुर दुनिया से एक नए सफर पर ले जाये जहाँ सिर्फ और सिर्फ रौशनी ही हो और अंधरे को ख़तम करने के लिए किसी चाँद और सूरज की रौशनी की जरुरत न पड़े.

मेरे हिसाब से तारों की जगमगाहट,किसी चाँद ,सूरज से  नहीं होती और शायद हर टूटते तारे की कमी हमें और चाँद , सूरज को ना हुई हो पर आसमां को हर टूटते तारे की कमी जरुर महसूस होती है, क्युकी उसके लिए तो हर तारा’’इक तारा है,जो खास और प्यारा है .          

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