जो रह गई ,सो गई ,
जो सह गई,सो सह गयी
दब गयी किसी पल्लव की छाँव में
वो ओस की एक बून्द ,
मेरे आँगन में छूप गई।
मुदतो बाद मिली हो तुम ,
नजाने कितना कहने को है तुमसे ,
पर सुकून है की तुम अब लौट आई हो ,
मेरे आँगन में वो बसी रही ,
ओस की वह बून्द मेरे आँगन में छिपी रही।
जो पल्लवों पर छिपी रही ,
धुप ई पहली किरण से बची रही ,
वह बची रही,डटी रही ,
तुम्हारे सज़दे में झुकी रही ,
ओस की वह बून्द मेरे आँगन में छिपी रही। मौसम भले ही अब बदल जाये ,
मेरा साथ जो तुम्हे न भाये ,
अब ना छोड़ अब वो न मुझे जाएगी ,
जीवन के पहर के बाद,
वो गम हो जाएगी '
वो कह गयी मुझे ,
ओस की एक बून्द ,
मेरे आँगन में छिप गयी।
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