Monday, 7 April 2014

ye plastic ke khiloane hai

                                                      प्लास्टिक के खिलौने है



खुशियो के खो जाने की शिकायत पुलिस थाने मे दर्ज होती तो लोग अक्सर
शिकायत दर्ज करवा आते ।और बच्चे शायद अपने बचपन के खो जाने की शिकायत
दर्ज करवाते ।ये वक्त स्कूलो मे नये दाखिले का है। माँ बाप अपने बच्चो को
कम से कम उम्र मे बड़े से बड़े स्कूल मे पढवाना चाहते है। मानो वो पैदा
होते ही वेल विहेव्ड बन जाए।आज के बच्चो मे मिट्टी की खुबी कम प्लास्टिक
जैसा दोहरा और पक्कापन ज्यादा है। पर उनमे उनकी कोइ गलती नही क्योकि वो
प्यार मासुमियत संवेदना नाम के खाद पानी से नही स्वार्थ और इक्किसवी सदी
के समझदारी से बने है। वो प्लास्टिक की तरह पक्के और स्थायी है।चाहे उनकी
खुबियाँ हो या खामियाँ।
कुछ तो उनके शौक है तो कुछ मजबूरी ।कभी साइकल का लालच तो कभी मोबाइल
का।ये लालच उन्हे ९० परशेंट अंक दिलवा देते है।पर उनके हुनर और रुचि का
क्या ? वो हरफनमौला तो बन जायेंगे पर हर फन मे अधुरे रह जायेंगे।पर इनमे
उनकी कोइ गलती नही और नही माँ बाप की।क्योकि उन्हे उम्र से ज्यादा भारी
बस्ता उठाने की आदत हो गई है,बचपना अब बेवकूफी बन गई है। किताबो की जगह
गुगल और खिलौने की जगह प्लेस्टेशन और विडिओ गेम ने ले लिया है।क्योकिअब
ये बच्चे कच्ची मिट्टी के नही ,ये तो प्लास्टिक के खिलौने है।

2 comments:

  1. hamesha ki tarah mast....mam,its my request apna pehla autograph mujhe hi dijiyega.....

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    1. ok dear waise bhi mujhe bharat ratna milne wala hai hahaha

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