Sunday, 6 April 2014

mere fauji papa ghar jaldi aana

                                              
                                                "मेरे फौजी पापा,घर जल्दी आना  "  


ढलती हुई शाम,गहरे जंगलों में रात जैसी प्रतीत होती हैं| दूर दूर तक वियावान जंगल और डरावनी ख़ामोशी,जितना संवेदनशील कश्मीर का यह वियावान जंगली इलाका और उतना ही डर वहाँ कि ख़ामोशी को तोड़ने वाले कुत्ते और शियार की रोने कि आवाज में | इन सबके बीच सीमा की पहरेदारी करते फौजियों के बूट  की आवाज़ इस डर को तुरंत में ही छूमंतर कर देती हैं |
  मैश में खाना खाने के बाद ड्यूटी चेक करते हुए,हवलदार मेजर रघुवेंद्र सिंह की पैरों कि आहट में वह बात नहीं | आज उसके बूट की आवाज़ ही बता रही है कि यह फौजी आज दुखी है,उत्साह की कमी है आज उसके जुनून में | वह सोच रहा है कि इस बार होली पर , माँ ने उसे बड़ी उम्मीद से  घर आने को कहा था और उसकी बीवी और बेटी का रेडियो के जयमाला कार्य कर्म में संदेश भी आया था कि ''मेरे फौजी पापा ,घर जल्दी आना | बार बार उसके मन को कचोटता है उसकी बेटी का यह संदेश,आज वह अपने आप को बड़ा बेवस महसूस कर रहा है,पर देश सेवा की दिलासा दे देकर वह अपने मन कि लहरों को शांत कर देता है|

 रघुवेंद्र अपने उदेहड़बुन में लगा हुआ था कि तभी उसके फौजी साथियों कि आवाज़ ने उसके सारे सोच को कुछ देर केलिए टाइम प्लीज कहकर पोस्टपोन्ड कर दिया |उनमे से एक ने पूछा:भाई रघुवेंद्र इतने परेशां क्यों हो?फौजियों की छुट्टी का रद्द हो जाना कोई नयी बात तो नहीं ,हमारी तो यही किस्मत है,होली पे दिवारों पर लगे रंगो के दाग दिवाली तक शिकायत करती है | और हम जब भी घर लौटे तो वह दिवारे मानो शिकायत करती हो ''याद है ,होली पर घर नहीं आये थे तुम|'' और उन्ही दागो को नए रंग पुतवा कर दिवारों और मन कि शिकायतों की भरपाई करनी पड़ती है |तो दूसरे जवान ने कहा :इस बार रघुवेंद्र ज्यादा दुखी इसलिए है क्योकि कुछ ही दिनों पहले हम फौजी भाईयो के लिए रेडियो पर आने वाले विशेष कार्यकर्म जयमाला में उसकी बेटी ने होली पर उसे घर बुलाया है और कहा है कि ''मेरे फौजी पापा घर जल्दी आना''| सच कहे तो यह सन्देश हमें भी रुलाती है,इतने प्यारे आदेश को कोई पिता पूरा न करपाए ,हाय!यह नौकरी । इस बात पर बिना रुके रघुवेंद्र बोल पड़ा:भाई पर हम यहाँ देश की सुरक्षा के लिए ही है,हम वचन बाध्य है और आखिर हमारे लिए सबसे पहले देश आता है ,फिर परिवार ,और फिर हम| 
       सब बातो में लगे हुए थे और तभी,हाथों में रम की बोतल और बोरोसिल का गिलास लिए कुछ और जवान आ गए| सभी खुश थे और चर्चा कर रहे थे कि कल होली है| फिर क्या,शाम और जाम चढ़ने लगी,सब हस बोल रहे थे | कोई अपने गॉव कि किचड़ वाली होली याद   कर रहा तो कोई गोबर वाली,किसी ने कहा कि ''हमारे यहाँ मथुरा में तो होली एक हफ्ते पहले ही शुरू हो जाती है तो दूसरे ने उसकी बात में हामी भरते हुए कहा ,:हाँ भाई ,पहले लठमार ,फिर लड्डूमर ,फिर फूलों और आखिर में रंगो की होली खेली जाती है | किसी ने कहा :भाई फिर तो मेरी बीवी को तो लाठी की भी जरुरत नहीं,वह अपने लम्बे कसे हुए बालों की चोटी से मार दे तो जहाँ पड़े वही लाल गुलाबी रंग रच आये | तो मेजर दिलीप ने कहा :यार माँ की बड़ी याद आती है,उनके मालपुआ का स्वाद से तो पूरा बिहार हिलजाये | बात छिड़ी तो जाम के साथ और बाते भी निकली| दिलीप की बात पर धर्मेन्द्र ने कहा :मेजर हमारी माँ तो गुजिया में इतने इलाइची डालती है कि उनका बस चले तो उसकी खुसबू हवाओं में मिलाकर यहाँ तक पहुँचा दे,तो एक जवान ने अपनी बीवी के गुस्से का बखान करते हुए कहा ,:क्या कहे मेजर,मेरी बीवी तो जितने पापड़ बनाती नहीं होगी ,उतने उसके गुस्से भरे  स्पर्श मात्र से ही टूट जाती होगी,और गुस्सा मेरे होली पर कभी घर न आने का | 

 रात चढ़ रही थी ,पर जवानों में अपनी यादों का इतना उत्साह था,यादों से भरी खुशियों में इतनी गर्मी थी की शर्द रात भी उन्हें शर्द प्रतीत नहीं हो रही थी| वियावान जंगल के बीच,खुले आसमां में अलाप के सामने राइफल्स के साथ सभी अपने अपने क्षेत्र कि होली याद कर रहे थे | सब यादों के रंग से रंगे हुए थे |कोई घर की होली से रंगा था तो कोई अपनी गलियों की छतों से फेंके जाने वाली बालटी भरे यादों के रंग से नहा रहा था | दिलीप अपने बच्चों के पिचकारी के रंगो में भींग रहा था कि अचानक उसे महसूस हुआ कि बंद आँखों के सामने किसी ने उसके सीने पर धारदार पानी की पिचकारी और गुब्बारे मार दिया हो ,आँख खोल देखा तो पाया कि सीना लाल रंग में सना हुआ था| अचानक शरहद पार से गोलियों से भरी पिचकारी चलने लगी | इस पिचकारी में इतनी आवाज़ और दर्द थी कि पूरा का   पूरा वातावरण थराह गया,हर तरफ लाल रंग बिखरे हुए थे,वह खूनी गाढ़ा लाल रंग |गोलियाँ इस पार से भी चल रही थी तो शरहद उस पार से भी,और सभी अपने अपने राइफल्स के साथ सीमा पर सज्य थे |सुबह की उस पहली लालिमा के साथ,वातावरण तोप के गोलों और गोलियों  की आवाज़ से थराह गया | खुब उठा पटक हुई,हर तरफ ढोल नगाड़ो से विपरीत,गोलियों की आवाज़ से वातावरण गूँज उठा और जहाँ विरान जमी हुआ करती थी,वहीं कुछ घंटो में ही लाशों से गालियाँ बन आई| यह कैसी होली थी!जहाँ शोर थी,पर खुशियो की नहीं दर्द की| होली का यह खूनी  लाल रंग,रण भूमि के इस युद्ध में हर तरफ छाया हुआ था और पापड़ के टूटने जैसी न सुनाई देने वाली आवाज़ थी पर सासों के टूटने की | जिस प्रकार होली के दिन हम अपने माँ बाप के चरणों में गुलाल रख उनका आशीष लेते है ठीक उसी प्रकार आज भारत माँ के चरणों में गुलाल की जगह वीरो के लाल रक्त थे| होली मनी पर तिरंगे के तीन रंग की सुरक्षा में,जिसमें खुब लाल रंग उड़ा| इस हमले में कई आतंकवादी मारे गए और हमारे भी कई जवान शहीद  हो गए| वही जवान जो कुछ देर पहले यादों की होली खेल रहे थे ,अब वह मौत की होली खेलकर भांग के नशे में नहीं,मौत के नशे में सो रहे थे | उन शहीदों में एक वीर रघुवेंद्र भी था | शरहद पर हर त्योहार का कुछ इसी तरीके का हाल होता हैं,होली खुन वाली होती है तो दिवाली पटाखों कि जगह बंदूको के आवाज़ में गुंजाने वाली होती है | आज तिरंगे में लिपटा हुआ रघुवेंद्र घर लौट रहा है,वही जवान जिसकी माँ और बीवी ने उसे होली पर घर बुलाया था | आज वही वीर घर लौट रहा है जिसकी शिकायती बेटी की अर्जी थी,
                                              "मेरे फौजी पापा,घर जल्दी आना | "  
 

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