Saturday, 23 August 2014

alarm baj gaya


मेरे कमरे के एक कोने में एक घड़ी लगी हैं और दूसरे खोने में ही एक पिक्चर गैलरी.इस पोट्रेट में मेरे घरवालों की कीमती यादों से भरे कुछ पल हैं.एक शाम जब मैं यूँ ही अपने उस दिवार को निहार रही थी तब मेरी नजर अचानक घड़ी के उन टिक टिकाते सुई पर पड़ी.उस घड़ी की और देखते देखते मुझे एक ख्याल आया.

हमारी जिंदगी भी तो एक घड़ी जैसी है जहाँ एक वक़्त हमारी दुनिया में सिर्फ दो लोग महत्व रखते है ठीक वैसे ही जैसे घड़ी के दो सुई मिनट वाली और घंटे वाली.पर बाद में उसमे सेकंड्स वाली सुई आकर पूरा का पूरा समय देखने का ही नजरिया बदल देती है और घड़ी अपने एक समय में ही कितनी विविधता के साथ वक़्त की इक  नयी कहानी लिख देती है.

हमारी दुनिया भी यूँ ही गोल है. हम लोग बचपन से मा बाप नाम के इक बिंदु से जुड़े होते है,फिर कुछ सेकंड्स बाद ,यानि कुछ सालो बाद चलते चलते हम अपने लिए राह बनाते है,बस सेकंड्स वाली सुई की तरह चलने  से कुछ मिनट्स पूरे हो जाते है,फिर कही जा कर हम रुकते है ,यानि हमें हमारी मंजिल मिल गयी और जीवन का एक पहर बीत गया.

पर यह क्या,  अब जो मंजिल मिली तो हमने एक पल जो पिछले बिताये सफ़र को देखने के लिए बस पीछे ही मुड़े की,झट से एक पल और बीत गया.और मेरी आँखे भी ठहर गयी.  मैंने देखा, इस लम्बे सफ़र में जहाँ मैं  कितनो के साथ चली थी,आज वह सब लोग कही न कही रुक गए थे .मा पापा दूर जा चुके थे,भाई बहन कहीं खो से गए थे और दोस्तों ने तो दूसरी ही घड़ी में शिफ्ट होने का मन बना लिया था.बस इस गोल घड़ी में सिर्फ, मैं बची थी .

टन,टन,टन.  पलक झपक गयी,घड़ी में १२ बज चुके थे, दो पहर  बीत गया था जिसमे जिंदगी कई पहर आगे चल चुकी थी. अब पता चला कि जिंदगी भी घड़ी की तरह कभी नहीं रूकती,जब तक की उसकी बैटरी न ख़त्म हो जाये.न सुख में ,न ही दुःख में,न किसी के आने से और न जाने से और कही जरा ठहरा भी तो अगले ही पल चलने का अलार्म बज गया.   ‘’it’s time to disko…..ho ho…hoooooo disko

 

 

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