Saturday, 15 March 2014

aaoo chale ghar se sansad ki oore

                                                                       आओ चले घर से संसद कि ओर

आज मेरे हाथ पर बंधी घड़ी और बदलते वक़्त की कहानी ही मेरी कहानी का अंश है | मेरे कलाई पर बंधी घड़ी ,जिसके बड़े डिब्बे जैसी डायल और उसकी मोटी कसी सिल्वर बैल्ट जहाँ मुझे वक़्त से बंधी हुई शस्क्त लड़की बनाती है ,वहीं डायल के अंदर का गुलाबी रंग मेरे मन  के मासुम कोने को बयाँ  करती है | पहले तो लड़कियाँ घड़ी बांधा ही नहीं करती थी या बांधती भी तो छुपाकर कलाई के नीचे बिलकुल पुरुषों से विपरीत,उनकी ऊपर तो हमारी नीचे | कहते हैं कि वक़्त तेज़ी से बदलता है पर स्त्रियों के मामलों में तो शायद वक़्त ने भी पैरों में बेड़िया बांध ली हो,आख़िरकार वक़्त बदला और घड़ी कलाई के नीचे से ऊपर आगई | उस युग से इस युग तक,मेरी नज़र सबसे पहले  जिस महिला पर पड़ी जिसके हाथों में मोटी गोल डायल वाली घड़ी कलाई के ऊपर बंधी थी वह थी स्वर्गीय श्रीमति इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी और मैंने सोच लिया कि घड़ी तो मेरी भी कलाई के ऊपर ही बंधेगी |  आज मेरी घड़ी के अंदर इंदिरा गाँघी कि घड़ी की तरह छुपा हुआ स्विस बैंक का अकाउंट नंबर तो नहीं पर घड़ी तो मेरी भी दमदार है |
      पर अगर सोचिये इसी घड़ी का वक़्त मैं पीछे कर दूँ और इतिहास में जाकर सोचूँ कि मैं कहाँ होती ?क्या होती और कैसी होती तो मेरा जवाब होता - मैं भारत में होती ,लड़की होती ,संसद में काम करती और मेरी छवि कुछ कुछ इंदिरा गाँधी जैसी होती | तो मैं बनती हमारे देश की पहली महिला और तीसरी प्रधानमंत्री आदरणीय इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी |  उस वक़्त से इस वक़्त तक की आयरन लेडी,सशक्त  और सम्मान से भरी महिल| क्या हुआ कि मेरे पापा जवाहरलाल नेहरू कि तरह देश के लिए जेल में नहीं रहे,पर कारगिल में देश के लिए सीमा पर तो थे | भले ही इंदिरा कि तरह मैंने इतिहास ''पिता का पत्र पुत्री के नाम से नहीं पढ़ा ,पर इतिहास पढ़ी तो सही | माना कि मैं अपने माँ पापा कि इकलौती औलाद तो नहीं पर इकलौती बिटिया तो हुँ | हिस्ट्री और पॉलिटिकल साइन्स उनकी  पसंद थी तो मुझे इंडियन हिस्ट्री और इंडियन पॉलिटिक्स पसंद है,और अगर आप मेरे काम पर गौर फरमाये कि आज तक मैंने पॉलिटिकल बीट पर ही काम किया है तो इस बात कि पुष्टि हो जायेगी कि कही ना कहीं इस क्रिएटिव राइटर का लंबा विशनरी नारा है ''आओ चले घर से संसद कि ओर ''|
अगर यह सपना है तो सपना ही सही पर मैं हर जन्म में लड़की और एक सशक्त नारी ही बनना चाहती हुँ ,जिंदगी का हर फैसला मेरा हो,मैं डॉमिनेटिंग हुँ और हर किमत पर अपनी धाक बनाये रखूँ | क्योकि ना तो मैं इतनी खूबसूरत और अच्छी कलाकार हुँ कि मैं  मधुबाला और मीनाकुमारी बनजाऊ और मैं ना कभी सीता और द्रौपदी बनना चाहती हुँ और अगर मैं इनकी जग़ह होती तो इनके फ़िल्म कि स्क्रिप्ट उलटी होती | सीता वन वन भटकने कि जग़ह राम को तलाख देकर अपने मायके से पापा का राज पाठ संभालकर कर राज करती तो द्रौपदी पाँच पुरुषों में बटने कि जगह पाँच पांडवों को पाँच टुकड़ो में बाँट देती और सारी की सारी महाभारत वहीं ख़त्म हो जाती | मैं आयरन लेडी ही बनना चाहती हुँ ,भले ही इंदिरा का सफ़र नेहरू से गाँधी तक था पर उन्होनें पापा के सत्ता कांग्रेस को तब सँभाला था मैं आज और कल पापा का मान और काज पाठ संभालूंगी ।उन्होने तबभी जात बिरादरी का दामन नहीं थामा था ,प्यार जिससे हुआ भले ही फ़िरोज गुजराती पारसी थे साथ उन्हीं का दिया | मैं यक़ीन से कह तो नहीं सकती क्योकि मेरे जीवन में कोई फ़िरोज तो नहीं और ना ही चाहिए पर सच्चा और संभला प्यार हुआ तो नेहरू कि तरह पापा को भी मना लूँगी । भले ही सरनेम चेंज हो जाये पर चलूँगी पापा के ही राह पर |
इंदिरा गाँधी बनने का कारण उनकी महानता नहीं उनकी विशेषता है । स्वभाव से कट्टर डॉमिनेटिंग गुस्सेल महिला पर नज़रिया क्रांति से विकास कि ओर | ईस्ट पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाना,पाक को हर बार हराना  और देश को ग्रीन रेवोलुशन के साथ सीटो ,सेंटो और रबीआई को सशक्त बना कर देश को शसक्त बनाना इस बात कि पुष्टि करता है | मैं यह सब करलेती पर १९८४ कि एंटी सीख़ रायट और सालों तक देश में इमरजेंसी लगा हिटलर कि तरह राज ना कर पाती और यही शायद  मेरी खूबी होती या ख़ामी पर आज मैं एक काम जरुर करती । थोड़ी कम पढ़ी लिखी ही सही पर देश की संसद कि आधी जनसंख्या मैं एक एक इंदिरा से भरवाती ,क्या होता फ़ैसले सिर्फ औरतों के पक्ष् में होते ,पर इसमें कोई गलत बात नहीं | गवार तो आज के मंत्री भी है ,सरेआम आशुबम ,चाकू और पेपरस्प्रे से आज वह संसद का यह हाल बना सकते है तो हम थोड़ा और बिगाड़ देते पर देश में रेपिस्टों को पनाह तो ना देते |
  अब बस बात यही है,आज हमें अपने हक़ के लिए लड़ना ही होगा ,पर उसे पाने के लिए सत्ता के उस कुर्सी पर हमारी जनसंख्या का ज्यादा होना ही होगा | अब इंदिरा से भी सशक्त महिला इस देश को चाहिए क्योकि इस बार लड़ाई पाकिस्तान से नहीं ,अपने ही देश ,अपने ही समाज से है । पुरुषवादी सोच से है और शायद एक एक पुरुष से है ,अब समाज को सीता ,लक्ष्मी नहीं काली और चंडी चाहिए । अब अंत में एक बात जो मेरे मन में है कि अगर मैं इंदिरा होती तो अपने मौत के बाद',राजीव कि जगह अपनी बेटी को प्रधानमंत्री बनते हुए या अपना राजपाठ सँभालते देखना चाहुँगी आखिर क्यों नहीं
                                         ''एक लड़की हुँ ,हक़ से लड़की ही मांगुंगी ,
                                                                                    और अगर संसार त्याग माँगे
                                               तो सबसे पहले पति को ही त्यागुंगी |
    तो चलिए हक़ कि लड़ाई लड़े ,माँगे नहीं हक़ बनाये और मेरे साथ कहें
                                                          ''आओ चले घर से संसद कि ओर ''|
                       

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