बचपन जिंदगी अगर धूप है ,तो छाव था बचपन
जिंदगी अगर आज शाम है ,तो सुबह था बचपन
जिंदगी अगर किताब है ,तो हमारी कहानी था बचपन
बचपन कुछ और नहीं ,
बस एक सुनहरी याद है बचपन |
वो दादा दादी ,नाना नानी
सबकी थी अपनी एक कहानी,
मानो बचपन के साथ हो गयी हो,
उनकी भी' रवानी ,
वो अनेक नाम गुड़िया,गुडी,पिंकी ,सिंकी
जिसमें सबका दुलार हमने था पाया
पर अब बस अपसोस भर है आया,
क्यों खो गया वह बचपन ,आ गया यह यौवन।
वो घंटों झूले झूलना,
झूले कि रेस लगाना,
मानो बस एक लक्ष्य यही हो,
कैसे भी आसमाँ को छू जाना,पर अब मानो
टूट गया वह झूला,क्योकि छूट गया वह बचपन।
वो ईदी और मिठाई,
वह शौख़ नये कपड़ो का,जन्मदिन पर लाखों बधाई,
अगर याद करो,तुम उन त्योहारों को
तो बचपन सब लौटा ले आयी,
आज बचपन कि याद है आई|
वो दोस्तों कि लंबी रेलगाड़ी,
मानो हम ही थे डिब्बे और सवारी
छूक छूक कर चल पड़ती थी वह रेलगाड़ी,
पर आज छूट गयी वह यारी,वह दोस्ती,वह रेलगाड़ी।
अब तो हर शाम उस प्लेटफर्म पर,खड़े रहें पर
फिर भी नहीं आती वह रेलगाड़ी,
वह रेलगाड़ी,जो मुझे मेरे बचपन में ले जाये,
मुझे मेरे अपनों से मिलवाये,
मेरे बचपन कि वह सवारी,
नहीं आती अब वह रेलगाड़ी।
वो गलियों में दौड़ लगाना,
थक कर माँ के आँचल में सो जाना,
फिर वह सूरज,चँदा कि लोरी
आँखों में जिसने कभी मिठी नींद थी घोली ,
पर ना अब वह लोरी है,ना वह मासूम आँखे
अब तो हर रात बस,चिंता भरी होती है,
स्वार्थ,स्वाभिमान,सुख और स्वम से लड़ाई होती है,
और थकी आँखे भी यही कहती है,
''अब ना अम्मा कि आँचल है,
न बाबा के कंधे,थक कर भी तुझे खुद ही चलना है,
क्योकि लक्ष्य है तेरे गहरे।
क्यों छूट गये वह हाँथ,वह स्वार्थहिन प्यार भरे पहरे ,
क्यों खो गया वह अपनापन,
क्यों खो गया वह बचपन।
जिंदगी अगर आज शाम है ,तो सुबह था बचपन
जिंदगी अगर किताब है ,तो हमारी कहानी था बचपन
बचपन कुछ और नहीं ,
बस एक सुनहरी याद है बचपन |
वो दादा दादी ,नाना नानी
सबकी थी अपनी एक कहानी,
मानो बचपन के साथ हो गयी हो,
उनकी भी' रवानी ,
वो अनेक नाम गुड़िया,गुडी,पिंकी ,सिंकी
जिसमें सबका दुलार हमने था पाया
पर अब बस अपसोस भर है आया,
क्यों खो गया वह बचपन ,आ गया यह यौवन।
वो घंटों झूले झूलना,
झूले कि रेस लगाना,
मानो बस एक लक्ष्य यही हो,
कैसे भी आसमाँ को छू जाना,पर अब मानो
टूट गया वह झूला,क्योकि छूट गया वह बचपन।
वो ईदी और मिठाई,
वह शौख़ नये कपड़ो का,जन्मदिन पर लाखों बधाई,
अगर याद करो,तुम उन त्योहारों को
तो बचपन सब लौटा ले आयी,
आज बचपन कि याद है आई|
वो दोस्तों कि लंबी रेलगाड़ी,
मानो हम ही थे डिब्बे और सवारी
छूक छूक कर चल पड़ती थी वह रेलगाड़ी,
पर आज छूट गयी वह यारी,वह दोस्ती,वह रेलगाड़ी।
अब तो हर शाम उस प्लेटफर्म पर,खड़े रहें पर
फिर भी नहीं आती वह रेलगाड़ी,
वह रेलगाड़ी,जो मुझे मेरे बचपन में ले जाये,
मुझे मेरे अपनों से मिलवाये,
मेरे बचपन कि वह सवारी,
नहीं आती अब वह रेलगाड़ी।
वो गलियों में दौड़ लगाना,
थक कर माँ के आँचल में सो जाना,
फिर वह सूरज,चँदा कि लोरी
आँखों में जिसने कभी मिठी नींद थी घोली ,
पर ना अब वह लोरी है,ना वह मासूम आँखे
अब तो हर रात बस,चिंता भरी होती है,
स्वार्थ,स्वाभिमान,सुख और स्वम से लड़ाई होती है,
और थकी आँखे भी यही कहती है,
''अब ना अम्मा कि आँचल है,
न बाबा के कंधे,थक कर भी तुझे खुद ही चलना है,
क्योकि लक्ष्य है तेरे गहरे।
क्यों छूट गये वह हाँथ,वह स्वार्थहिन प्यार भरे पहरे ,
क्यों खो गया वह अपनापन,
क्यों खो गया वह बचपन।
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