Saturday, 22 March 2014

is tarah ham alag huye(ek swarthi kahani)

                                           इस तरह हम अलग हुए(एक स्वार्थी कहानी)


कहते है इंसान अगर अपने स्वार्थ,शान और दौलत कि रेस में उतर जाये तो सारे रिस्ते नाते,प्यार,मुहबत अपने आप ही पीछे छूट जाते हैं। मेरी जीवन रूपी किताब का एक अंश थे वह दिन जिसकी आहट आज भी मेरी यादों में होती हैं| आज भी जब मेरी डायरी के पन्ने कि वह तारीख़ आँखो के सामने आती है तो दिल एक बार फिर दोहराता हैं काश कि वह दिन फिर लौट आते | पर कहते हैं न कि जीवन एक फुलप्रूफ प्लान कि तरह है, जिसमे हुई गलतियों को डिलीट कर ठीक करने कि गुंजाइश नहीं होती |
4 /9 /2006 ,
                     मेरा वह 21 वॉ जन्मदिन,उम्र कि एक वह दहलीज़ जहाँ अक्सर माँ पापा के बंधन खत्म होने लगते हैं | उठते ही माँ पापा की बधाई और उसके मैसेज के साथ मेरा दिन शुरू हुआ,पर मुझे तो शाम का बेसब्री से इंतजार था क्योकि पास के कॉफी हाउस में मेरा कोई इंतजार कर रहा था| शाम होते ही मैं नीले रंग के ड्रेस में तैयार हो जल्दी से वहाँ पहुँच गई | कॉफी हाउस के अंदर जाते ही मेरी नज़र कार्नर में सजे हुए टेबल पर पड़ी जो लाल और पीले रंग के गुलाब कि पंखड़ियों सजा हुआ था पर उसके आस पास कोई नहीं था | मैं यहाँ वहाँ देख रही थी कि तभी मेरे कानो ने सुना -हैप्पी बर्थडे टो यू,,,,,,,,,,,और मैं मुड़ी।मैंने देखा कि वहाँ मेरे दोस्त और देव खड़ा था और यह सारी तैयारियाँ उन सब ने मेरे लिए किया था| बहुत प्यारा था मेरा वह जन्मदिन और शायद ही अब कभी ऐसा हो मेरा जन्मदिन|
8/9/2006
                  देव और मैं एक दूसरे को बचपन से जानते है| देव कि कहानी मेरी कहानी जैसी है यानि मेरी जिंदगी सी बिलकुल वही लक्ष्य को पाने कि जुनून और वही स्वार्थी पन जो स्वभाव को लॉजिकल और संवेदन हिन् बना दे । आज वह पुणे जा रहा है अपने एमबीए कि पढ़ाई के लिए| देव के माँ बाप पुणे में ही रहते हैं और देव यहाँ दिल्ली में अपने दादा के साथ पिछले आठ से रहता था | हम दोनों स्कूल से ग्रेजुएशन तक साथ ही पढ़ते थे, और पहली बार मुझे किसी के दूर जाने से दुख हो रहा था मानो शायद देव के साथ मेरा बचपन भी छूट रहा था |
         पहले तो शुरुआती दिनों में देव और मै एक दूसरे से हर दूसरे दिन बात किया करते थे पर धीरे धीरे हमारी बातें कम और काम ज्यादा होना शुरू हो गया| हम दोनों ही अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त थे, कि धीरे धीरे हम दोनों ने एक दूसरे का फ़ोन नंबर भी गुमा दिया|   इस सोशल नेटवर्किंग के ज़माने में हम एक दूसरे को नहीं ढूँढ पाये इस बात का जबाब शायद हमें हमारा स्वार्थी  मन और भगवान ही दे सकता था, और इस तरह हम अलग हुए उसके पुणे जाने के बाद

18 /11 /2013 ,
                       आज़ मैं अपनी कंपनी के एक पार्टी में थी । मैंने पार्टी में देव को देखा,वह वहाँ हमारे कंपनी के मेन आसोसिअट्स में था पर मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि यह वही देव है ,मेरे बचपन का दोस्त देव| जब मेरे बॉस ने उसे इंट्रोडस कराया''देव शर्मा,आवर मेन एसोसिएट्स फ्रॉम पुणे''तो मेरा यकीं सच में बदल गया| काफी सोच विचार के बाद अपने ईगो को साइड में रख मैं देव के पास गई,मुझे देकते ही वह पहचान गया| देव आज भी वैसा ही था,उसने उतावले होकर मेरे सामने -कैसी हो ,कहाँ थी ,,,,,,प्रश्नो कि वर्षा कर दी और साथ में अपना हाँथ भी बढ़ा दिया |
     मैंने जैसे ही उसकी तरफ अपना हाँथ बढ़ाते हुए बोलना शुरू ही किया था कि,तभी एक प्यारे से बच्चे ने आकर देव कि पैंट खिंचते ,एक औरत जिसकी सक्ल से ज्यादा उसकी साड़ी और महंगी घड़ी चमक रही थी,उसकी ओर उँगली दिखाते हुए कहा ''पापा ,मम्मा बुला रही हैं |
बस होना क्या था ,मैं अबाक रह गई और पलभर में ही मेरी सारी कल्पानाओं पर पानी फीर गया| मैंने देव कि आँखों में देखा मानो आज उसने मेरी मन कि बात समझ ली थी और मैं दुखी मन से घर लौट आई  |मैं पूरी रात सो नहीं पायी ,मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे दुःख किस बात का हुआ ?देव की शादी का या इस बात कि शायद वो जगह मेरी हो सकती थी,या एक जलन जो एक औरत को दूसरे औरत कि सफल जिंदगी से होता हैं| हाय यह स्वार्थ,जो हमारा नहीं होता,उसपर भी अपना हक़ जताना चाहता है |
19 /11  /2013,
                         आज सुबह मेरी मोबाइल पर अंजान नंबर से कॉल आया,उठाने पर पता चला कि वह देव का कॉल था| उसने मुझे फिर उसी कॉफी हाउस में मिलने बुलाया था,आज फिर मैं वही गई थी| आज भी देव मेरा उसी कार्नर के टेबल पर इंतजार कर रहा था पर इस बार उस टेबल पर न लाल गुलाब थे न पीले मानो वक़्त भी यही कह रहा हो कि ''पलक,अब न प्यार बचा है और न शायद दोस्ती |
           मेरे जाते ही देव कुछ कहता कि मैं उसपे तुरंत चिल्ला पड़ी,मैंने कहा,'' देव,तुम मुझे भूल गए थे ना?आज इतने साल बाद भी मैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी ,इंतजार अपने दोस्त का और शायद प्यार का| आज पहली बार मेरे दिल ने सच कहा था या फिर उसने भावनाओं का मजाक बनाकर अपने स्वार्थ और जलन को प्यार का नाम दे दिया था | पता नहीं यह क्या था पर मुझे पहली बार इतना दुःख हो रहा था,पर इस बात ने हम दोनों को शांत कर दिया था| उस शांत वातावरण कि चुप्पी देव के उस आखरी बात ने तोड़ी ''सच कहा पलक,प्यार''और आज हमेशा के लिए इस तरह हम अलग हुए |   


      आज हम दोनों ने अपने झूठे घमंड को देखा जो हमें हमारी कामयाबी पर था,और आज यहाँ से देखने पर हम अकेले नज़र आ रहे थे,बिल्कुल अकेले साथ थी तो बस अपसोस।अपसोस कि हमने अपने दिमाग का इतना इस्तेमाल किया था कि दिल कि भावनाये मर चुकी थी| आज मुझे एहसास हुआ कि इस कामयाबी कि दौड़ में, मैं शायद अवव्ल थी पर भावनाओं कि दौड़ में  पीछे और अकेले,सब आगे है, शायद देव भी।
           अब मेरी डायरी के पन्ने खाली पड़े हैं क्योकि अब इस में लिखने को कोई कहानी नहीं है | अब मेरे पास कामयाबी है पर कोई अपनी कहानी नहीं,जिसे मैं यह नाम दे सकूँ ''एक स्वार्थी कहानी| '' 

 

 

1 comment:

  1. Sach kaha apne aap ko kamyaab banate banate hum sab kuch kho dete hain....shayad sacha pyar bhi...

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