फूल कुम्हलाने लगे है
क्यों ये फूल कुम्हलाने लगे हैं,
बागों को छोड़कर सड़क पर नज़र आने लगे हैं,
फूल कुम्हलाने लगे है |
वह फूल जिनकी जग़ह है बगिया'
वह कूड़े के ढ़ेर में,
अपनी मुस्कुराहट लुटाने लगे हैं,
फूल कुम्हलाने लगे है|
वह कूड़े के ढ़ेर में,
अपनी मुस्कुराहट लुटाने लगे हैं,
फूल कुम्हलाने लगे है|
यूँ तो हमारे देश में नहीं हैं विद्यालयों कि कमी ,
फिर क्यों?यह विद्यार्थी नहीं ,
सड़कयात्री कहलाने लगे है,
पैसे कि राह में बहुमुल्य बचपन,
बिताने लगे हैं,फूल कुम्हलाने लगे है।
यूँ तो नियम व कानून की,
दलीलें है नजाने कितने,
आरक्षण,सरकारी स्कूल,मिड डे मील जैसे
पहेली है जितने।
आज समाज बाल शोषण के नाम पर
बहाने बनाने लगी है,
यह नन्हें मासुम फूल,
अस्तित्वहिन हो जाने लगे है,
फूल कुम्हलाने लगे है|
अपने भाषणों में हम,हमारे नेता
विकास की,देते तो हैं दलीलें,
तो फिर क्यों यह फूल
कड़ाके कि ठण्ड हो या गर्मी,
नंगे पाँव सड़क पर,
नज़र आने लगे हैं,
ये फूल कुम्हलाने लगे हैं|
नजाने कब यह हालात बदलेंगें,
कब यह तस्वीर बदलेगी,
कब यह फूल बगिया को लौटेंगें'
अपना बचपन जियेंगे,
चाचा नेहरू के यह प्यारे फूल,
कब खिलेंगे?
खिलकर उस क्षितिज को छुयेंगे,
कब?हम कह सकेंगें
हर हाथ में कलम लहराने लगे हैं,
फूल मुस्कुराने लगें हैं,
बगियों को सजाने लगे हैं।
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