छज्जे छज्जे का प्यार
आज जहाँ शहर बढ़ रहे हैं , वहीं शहरों में मकान और उनके बीच कि दूरियाँ ना के बराबर हो रही है |
जहाँ घरों से आँगन गायब हो रहा है | वही घर के हर तल्ले पर धूप और रौशनी के लिये छज्जा तैयार है,वैसे ही जैसे आजकल का नया बुखार इश्क़ जो हर किसी के सर चढ़ कर बोलता है।और इस बिमारी के लक्षण किसी महीने बढ़ भी जाते है|यहाँ हर आशिक अपनी आशिकी एक को दो बनाकर हिट करने के लिए बेताब हो जाता है|कुछ ऐेसी ही दास्ता ही लल्लन पाठक की | लल्लन पाठक जो यूँ तो कॉलोनी क्रिकेट का एक पसंदीदा खिलाड़ी है पर आजकल वह कॉलोनी में घूमते नज़र नहीं आ रहे | कॉलोनी वालों कि माने तो खिड़कियों और दरवाज़ों को चटकाने वाला अशांति फैलाने वाला देव दूत आज कल अपने घर में ही रहता है और कुछ दिनों से उसने और उसके दोस्तों ने रात को कॉलोनी को निशुल्क पहरेदारी प्रदान करना बंद करदिया है और सब के लवो पर एक ही सवाल है, आख़िरकार कहाँ है उनका अशांति दूत लल्लन ? आख़िर क्या हो गया उस आवारागर्द लड़के को, क्यों शांति है कॉलोनी में|
अगर जीवन एक फिल्म समझे तो,कैमेरे का एक एंगल लल्लन के छज्जे कि ओर करे तो पता चलेगा कि लल्लन पाठक अपना पूरा समय अपने किताबों को दे रहे हैं | और इस बदली हवा का कारण है सामने वाले घर में आई तिवारी जी की बिटिया शिवानी | जिसे मन ही मन लल्लन चाहने लगा है और लड़की के सामने अपना रेपोरेट सही करने के लिए आजकल वह समय पर कॉलेज जाता है और हर शाम नियम से अपने छज्जे पर पढ़ाई करते दिखता है | जहाँ कैमेरे के एक एंगल से वह पढ़ते दिखाई देता है वही एंगल चेंज कर देखे तो पता चलेगा कि तिवारी जी कि बिटिया शिवानी के दर्शन का प्यासा दिखता है|आख़िरकार रोज़ छज्जे पर वक़्त बिताने का नतीजा यह हुआ कि शिवानी कि नज़र उस पर पड़ ही गई और छज्जे छज्जे का प्यार परवान चढ़ने लगा|वही कभी कबार यह प्यार दोनों के घर वालो को देखकर छज्जे से झेंप जाया करती थी |
आजकल वक़्त और इंसान दोनों कि फितरत मौशम जैसी हो गयी है,कब बदल जाये पता नहीं | लल्लन के प्यार भरे दिन और छज्जे छज्जे का प्यार परवान चढ़ने लगा और आया मौसम महोब्बत का , यानि फरवरी का | बाज़ार लाल रंग से सज चुके थे ,दस रुपये का गुलाब पचास रुपये में अपना लाल रंग बिखेर रहे थे | चॉकेलट और टेडीबियर अलग ही अपना भावबढ़ाये हुए थे | वहीं आज बहुत से आशिकों को हज़ारो कि चपत लगने वाली थी ,पर कोई गम नहीं ,पैसे जाये तो जाये पर कमसेकम इस वैलेंटाइन के लिए प्यार न जाये | तो लल्लन भी किसी किमत पर अपने बदलते मौशम के प्यार को अपने मन कि बात बता देना चाहता है | और इस उधेड़बुन के साथ एक बार फिर लल्लन आज अपने दोस्तों के पास जा पहुँचा | कॉलोनी पार्क में एक बार फिर जमघट लगी और चर्चा का विषय था ''लल्लन के प्यार को इस वैलेंटाइन पर क्या उपहार?''चर्चा शुरू हुई -
लल्लन :भाई सोच रहे है 'लाल गुलाब देकर सारी कहानी ही खत्म करे| कि इस बात का कटाक्छ करते हुए पप्पू बोल पड़ा :अरे भाई रिस्क ना लो,एक बार जो एप्लीकेशन रिजैक्ट हो गया तो दोबारा चांस मिले न मिले! मेरी मानो तो शुरुआत पीले गुलाब से करो| कि तभी छोटू पूछ पड़ा : गुरु लाइन तो क्लेयर है न ! तो लल्लन ने उतावला हो जवाब दिया,हाँ भाई दिखाया तो था तुम्हें ,कैसे वह रोज़ हमें देख कर मुस्कुराया करती है | आख़िर कार गहन तर्कवितर्क के बाद बिल पास हुआ की लल्लन पाठक अपने प्यार कि शुरुआत लाल गुलाब से करेंगे | जैसे तैसे रोज़ डे पर गुलाब छुप छुपाकर शिवानी के छज्जे पहुँचा,फिर चॉक्लेट और इस तरह कारवां , गुले गुलज़ार दिल बेताब दिन वैलेंटाइन तक पहुँचा| फिर पहले तो लल्लन ने शिवानी से कहीं बाहर मिलने का विचार बनाया पर किन्हीं कारणों से उसके सफ़ल न होने पर दोपहर दो बजे, जब सारी कॉलोनी आराम फ़रमाती है तब दोनोंने प्यार फ़रमाने का वक़्त रखा |
लल्लन पहले से छज्जे पर जा पहुँचा, पर हमेशा कि तरह लड़की देर से पहुँची, आख़िर कार इंतज़ार ख़त्म हुआ शिवानी को देख लल्लन कि आँखों में चमक दौर गई और वह अपने आप को रोक न सका | और वह इस छज्जे से उस छज्जे जा पहुँचा और घुटने के बल उसने अपने दिल कि बात शिवानी को बता दी | शिवानी कि हाँ सुनते ही मानो मौसम बदल गया और इस फिल्म का सीन चेंज होगया| लल्लन और शिवानी एक दूसरे में खोये हुए थे कि उन्हें तिवारीजी के आने कि आहट भी नहीं लगी| पर तिवारीजी इस फिल्म के विलन निकले और मौकयावरदात पर हाथों में प्यार के हथकंडो के साथ शिवानी और लल्लन धरे गए | वैलेंटाइन डे देखते ही देखते स्लैप डे में बदल गया मानो शारुख खान के मुहब्ते में सनी देओल का ग़दर चलने लगा और इस तरह प्यार का भूत परवान चढ़ने से पहले ही उतर गया |
अब शिवानी इस कॉलोनी में नहीं रहती,अब वह पीछे के दूसरी कॉलोनी में रहती है | लल्लन का जीवन आज भी वैसे ही चल रहा है ,कॉलोनी में अब फिर अशांति है | क्रिकेट और पहरेदारी फिर शुरू हो गयी है क्योकि कॉलोनी वालो का अशांति दूत आबारगर्द लल्लन लम्बी बिमारी के बाद ठीक हो आया है | लल्लन अब कभी कबार शिवानी के कॉलोनी में भी चक्कर लगा आता है पर फिर भी जब जब उसकी नज़र सामने वाले छज्जे पर पड़ती है तो,एक बार फिर उसके दिल में हिचकोले खाता है वह प्यार ''छज्जे छज्जे का प्यार ''|
अगर जीवन एक फिल्म समझे तो,कैमेरे का एक एंगल लल्लन के छज्जे कि ओर करे तो पता चलेगा कि लल्लन पाठक अपना पूरा समय अपने किताबों को दे रहे हैं | और इस बदली हवा का कारण है सामने वाले घर में आई तिवारी जी की बिटिया शिवानी | जिसे मन ही मन लल्लन चाहने लगा है और लड़की के सामने अपना रेपोरेट सही करने के लिए आजकल वह समय पर कॉलेज जाता है और हर शाम नियम से अपने छज्जे पर पढ़ाई करते दिखता है | जहाँ कैमेरे के एक एंगल से वह पढ़ते दिखाई देता है वही एंगल चेंज कर देखे तो पता चलेगा कि तिवारी जी कि बिटिया शिवानी के दर्शन का प्यासा दिखता है|आख़िरकार रोज़ छज्जे पर वक़्त बिताने का नतीजा यह हुआ कि शिवानी कि नज़र उस पर पड़ ही गई और छज्जे छज्जे का प्यार परवान चढ़ने लगा|वही कभी कबार यह प्यार दोनों के घर वालो को देखकर छज्जे से झेंप जाया करती थी |
आजकल वक़्त और इंसान दोनों कि फितरत मौशम जैसी हो गयी है,कब बदल जाये पता नहीं | लल्लन के प्यार भरे दिन और छज्जे छज्जे का प्यार परवान चढ़ने लगा और आया मौसम महोब्बत का , यानि फरवरी का | बाज़ार लाल रंग से सज चुके थे ,दस रुपये का गुलाब पचास रुपये में अपना लाल रंग बिखेर रहे थे | चॉकेलट और टेडीबियर अलग ही अपना भावबढ़ाये हुए थे | वहीं आज बहुत से आशिकों को हज़ारो कि चपत लगने वाली थी ,पर कोई गम नहीं ,पैसे जाये तो जाये पर कमसेकम इस वैलेंटाइन के लिए प्यार न जाये | तो लल्लन भी किसी किमत पर अपने बदलते मौशम के प्यार को अपने मन कि बात बता देना चाहता है | और इस उधेड़बुन के साथ एक बार फिर लल्लन आज अपने दोस्तों के पास जा पहुँचा | कॉलोनी पार्क में एक बार फिर जमघट लगी और चर्चा का विषय था ''लल्लन के प्यार को इस वैलेंटाइन पर क्या उपहार?''चर्चा शुरू हुई -
लल्लन :भाई सोच रहे है 'लाल गुलाब देकर सारी कहानी ही खत्म करे| कि इस बात का कटाक्छ करते हुए पप्पू बोल पड़ा :अरे भाई रिस्क ना लो,एक बार जो एप्लीकेशन रिजैक्ट हो गया तो दोबारा चांस मिले न मिले! मेरी मानो तो शुरुआत पीले गुलाब से करो| कि तभी छोटू पूछ पड़ा : गुरु लाइन तो क्लेयर है न ! तो लल्लन ने उतावला हो जवाब दिया,हाँ भाई दिखाया तो था तुम्हें ,कैसे वह रोज़ हमें देख कर मुस्कुराया करती है | आख़िर कार गहन तर्कवितर्क के बाद बिल पास हुआ की लल्लन पाठक अपने प्यार कि शुरुआत लाल गुलाब से करेंगे | जैसे तैसे रोज़ डे पर गुलाब छुप छुपाकर शिवानी के छज्जे पहुँचा,फिर चॉक्लेट और इस तरह कारवां , गुले गुलज़ार दिल बेताब दिन वैलेंटाइन तक पहुँचा| फिर पहले तो लल्लन ने शिवानी से कहीं बाहर मिलने का विचार बनाया पर किन्हीं कारणों से उसके सफ़ल न होने पर दोपहर दो बजे, जब सारी कॉलोनी आराम फ़रमाती है तब दोनोंने प्यार फ़रमाने का वक़्त रखा |
लल्लन पहले से छज्जे पर जा पहुँचा, पर हमेशा कि तरह लड़की देर से पहुँची, आख़िर कार इंतज़ार ख़त्म हुआ शिवानी को देख लल्लन कि आँखों में चमक दौर गई और वह अपने आप को रोक न सका | और वह इस छज्जे से उस छज्जे जा पहुँचा और घुटने के बल उसने अपने दिल कि बात शिवानी को बता दी | शिवानी कि हाँ सुनते ही मानो मौसम बदल गया और इस फिल्म का सीन चेंज होगया| लल्लन और शिवानी एक दूसरे में खोये हुए थे कि उन्हें तिवारीजी के आने कि आहट भी नहीं लगी| पर तिवारीजी इस फिल्म के विलन निकले और मौकयावरदात पर हाथों में प्यार के हथकंडो के साथ शिवानी और लल्लन धरे गए | वैलेंटाइन डे देखते ही देखते स्लैप डे में बदल गया मानो शारुख खान के मुहब्ते में सनी देओल का ग़दर चलने लगा और इस तरह प्यार का भूत परवान चढ़ने से पहले ही उतर गया |
अब शिवानी इस कॉलोनी में नहीं रहती,अब वह पीछे के दूसरी कॉलोनी में रहती है | लल्लन का जीवन आज भी वैसे ही चल रहा है ,कॉलोनी में अब फिर अशांति है | क्रिकेट और पहरेदारी फिर शुरू हो गयी है क्योकि कॉलोनी वालो का अशांति दूत आबारगर्द लल्लन लम्बी बिमारी के बाद ठीक हो आया है | लल्लन अब कभी कबार शिवानी के कॉलोनी में भी चक्कर लगा आता है पर फिर भी जब जब उसकी नज़र सामने वाले छज्जे पर पड़ती है तो,एक बार फिर उसके दिल में हिचकोले खाता है वह प्यार ''छज्जे छज्जे का प्यार ''|
What a Story yr... Too good..!!
ReplyDeleteThis should b publish in some love stories books.. Awesome..
cha gya chajje ka pyar.....
ReplyDeletelallan ji ke pyar ka bukar badi jaldi utar gaya......mindblowing story..dil ko chu gaya chajje chajje ka pyar...
ReplyDeleteTHANKS
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